Supreme Court News: धर्मांतरण के बाद आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मद्रास हाईकोर्ट का आदेश बरकरार

हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने पर अपने-आप नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी का लाभ; तमिलनाडु सरकार की याचिका खारिज
नई दिल्ली। आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म से इस्लाम में धर्मांतरण करने मात्र से किसी व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (BC Muslim) श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए तमिलनाडु सरकार की याचिका खारिज कर दी। यह फैसला धर्मांतरण के बाद आरक्षण की पात्रता और समुदाय प्रमाणपत्र से जुड़े मामले में आया है। <Cite refs={[“turn664574news17″,”turn664574news2”]}/>
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस्लाम अपनाने से किसी व्यक्ति को अपने-आप तमिलनाडु की अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं माना जा सकता। पहले की जाति या समुदाय की पहचान के आधार पर नई धार्मिक-सामाजिक श्रेणी में आरक्षण का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं होता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल धर्मांतरण के आधार पर संबंधित पिछड़ा वर्ग समुदाय का प्रमाणपत्र हासिल नहीं किया जा सकता। <Cite refs={[“turn664574news2″,”turn664574news4”]}/>
मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी
यह मामला तमिलनाडु सरकार के वर्ष 2024 के उस सरकारी आदेश से जुड़ा था, जिसके तहत कुछ पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति के लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई थी।
मद्रास हाईकोर्ट ने 25 जून 2026 को इस आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। <Cite refs={[“turn664574news5″,”turn664574news18”]}/>
आरक्षण के लिए समुदाय की पात्रता जरूरी
इस फैसले का मुख्य बिंदु यह है कि धर्मांतरण अपने-आप किसी व्यक्ति को अधिसूचित पिछड़ा वर्ग समुदाय का सदस्य नहीं बनाता। आरक्षण का लाभ संबंधित कानून और निर्धारित पात्रता के अनुसार ही दिया जा सकता है।






