दिल्ली में आदिवासी महा समागम: डीलिस्टिंग की मांग पर राष्ट्रीय स्तर पर गरमाई बहस

धर्म परिवर्तन और एसटी आरक्षण को लेकर उठी नई मांग
नई दिल्ली। धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी से बाहर करने की मांग अब राष्ट्रीय स्तर पर बड़े आंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर राजधानी दिल्ली में जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले देशभर के आदिवासी समुदायों का विशाल महा समागम आयोजित किया जा रहा है। आयोजन में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोगों की भागीदारी का दावा किया गया है।
डीलिस्टिंग बिल को लेकर तेज हुई मांग
दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम का केंद्र बिंदु लंबे समय से चर्चा में रहा डीलिस्टिंग बिल है। जनजातीय संगठनों का कहना है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और पारंपरिक आदिवासी संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक व्यवस्था से अलग हो चुके हैं, उन्हें एसटी सूची से बाहर किया जाना चाहिए।
आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर
संगठनों का कहना है कि आदिवासी समाज को संविधान के तहत मिला आरक्षण और संरक्षण उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक जीवनशैली को संरक्षित रखने के उद्देश्य से दिया गया था। उनका आरोप है कि वर्षों से मिशनरी गतिविधियों के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुए हैं, जिससे सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं पर असर पड़ा है।
देशभर से पहुंचे आदिवासी समुदाय के लोग
इस महासमागम में गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों सहित देश के विभिन्न हिस्सों से लोग शामिल होने पहुंचे हैं। कई क्षेत्रों में पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ लोगों को दिल्ली रवाना किया गया।
छत्तीसगढ़ के नेताओं की भी रही मौजूदगी
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ से मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित कई प्रमुख आदिवासी नेता भी शामिल हुए। कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को सुरक्षित रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समाज की मूल पहचान को संरक्षित रखने के लिए गंभीर विचार की आवश्यकता है।
मुद्दे पर तेज हुई वैचारिक और राजनीतिक चर्चा
इस मुद्दे ने देशभर में नई वैचारिक और राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। समर्थक इसे आदिवासी अस्मिता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रश्न बता रहे हैं, जबकि इस विषय पर विभिन्न पक्षों से अलग-अलग विचार भी सामने आ रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी पड़ सकता है प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में डीलिस्टिंग से संबंधित कोई विधायी प्रस्ताव आता है, तो इसका प्रभाव कई राज्यों की राजनीति और आरक्षित सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है। हालांकि वर्तमान में यह विषय चर्चा और मांग के स्तर पर है तथा किसी संभावित कानूनी बदलाव को लेकर अंतिम निर्णय भविष्य की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।






