छत्तीसगढ़

रायगढ़: कलमा बैराज परियोजना में भू-अर्जन विवाद से लागत 163 करोड़ से बढ़कर 899 करोड़ तक पहुंची, मुआवजा वितरण पर गंभीर सवाल

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रायगढ़। महानदी पर बने कलमा बैराज में भू-अर्जन विवाद ने बढ़ाई परियोजना की लागत

Raigarh जिले में महानदी पर बने कलमा बैराज को बने हुए लगभग दस वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन भू-अर्जन से जुड़ा विवाद अब भी समाप्त नहीं हुआ है।

चंद्रपुर और सूरजगढ़ पुल के बीच बने इस बैराज की योजना में शुरू से ही भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं, जिसका असर अब परियोजना की कुल लागत पर साफ दिखाई दे रहा है।


2011 में शुरू हुआ निर्माण, 2016 में पूरा हुआ प्रोजेक्ट लेकिन विवाद जारी

कलमा बैराज का निर्माण वर्ष 2011 में शुरू हुआ था और 2016 में इसे पूरा कर लिया गया। शुरुआत में इस परियोजना की अनुमानित लागत 163 करोड़ रुपये थी।

करीब 200 हेक्टेयर भूमि डुबान क्षेत्र में आने के कारण अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले से ही जटिल मानी जा रही थी, लेकिन समय पर सर्वे और मुआवजा प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।


भू-अर्जन में अनियमितताओं के आरोप, अधिकारियों और दलालों की भूमिका पर सवाल

स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि शुरुआती चरण में सर्वे सही तरीके से नहीं किया गया, जिसके चलते बाद में जमीन से जुड़े विवाद बढ़ते गए।

सूत्रों के अनुसार, जमीन दलालों और कुछ राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से मुआवजा वितरण में गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आईं, जिससे परियोजना की प्रक्रिया लगातार प्रभावित होती रही।


लागत में भारी वृद्धि: 163 करोड़ से बढ़कर 899 करोड़ तक पहुंची राशि

परियोजना की लागत समय के साथ कई बार संशोधित हुई।

  • वर्ष 2016 में निर्माण पूरा होने तक लागत 163 करोड़ रुपये थी।
  • वर्ष 2023 में पहला संशोधन हुआ और लागत बढ़कर 568 करोड़ रुपये हो गई।
  • वर्ष 2026 में फिर से संशोधन के बाद कुल लागत 899 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

इस तरह परियोजना की लागत लगभग छह गुना तक बढ़ गई है।


मुआवजा विवाद और अदालतों में मामले, किसानों की याचिकाएं बढ़ीं

भू-अर्जन प्रक्रिया पूरी न होने के कारण कई किसान अब न्यायालय का रुख कर रहे हैं। अदालतों से ब्याज सहित मुआवजा देने के आदेश भी मिल रहे हैं, जिससे सरकारी खर्च और बढ़ता जा रहा है।


फर्जी दावों और संदेहास्पद भुगतान के आरोप

2024 से पहले किए गए मुआवजा वितरण पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ मामलों में ऐसी जमीनों के लिए भी मुआवजा दे दिया गया, जो डुबान क्षेत्र में नहीं आती थीं और जहां अब भी खेती जारी है।

सूत्रों के अनुसार, एक कथित जमीन दलाल की भूमिका को लेकर भी जांच की बात सामने आ रही है, जबकि राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।


सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ, जवाबदेही पर उठे सवाल

लगातार बढ़ती लागत और ब्याज सहित मुआवजा भुगतान के कारण सरकार पर भारी वित्तीय दबाव पड़ रहा है। अनुमान के अनुसार, अनियमितताओं के चलते सैकड़ों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ चुका है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शुरुआत में ही सही सर्वे और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती, तो यह परियोजना आज इतने बड़े विवाद में नहीं फंसती।

रायगढ़ के कलमा बैराज प्रोजेक्ट में भू-अर्जन विवाद के कारण लागत 163 करोड़ से बढ़कर 899 करोड़ रुपये हो गई है। मुआवजा वितरण में अनियमितताओं, फर्जी दावों और राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। किसान न्यायालय का रुख कर रहे हैं।

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