छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में बढ़ती निरक्षरता चिंता का विषय: 2026 तक 1 करोड़ 4 लाख से अधिक आंकड़ा, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। लगातार जनसंख्या वृद्धि के बावजूद राज्य में निरक्षर लोगों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती नजर आ रही है। यह स्थिति तब है जब प्रदेश में वर्षों से साक्षरता बढ़ाने के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं।

आंकड़ों में खुलासा: निरक्षर आबादी में बढ़ोतरी का अनुमान
आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग के अनुसार 2011 की जनगणना के बाद वर्ष 2026 तक राज्य में निरक्षर आबादी में वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। आंकड़ों के मुताबिक 2011 में निरक्षर लोगों की संख्या लगभग 1 करोड़ 1 लाख थी, जो 2026 तक बढ़कर 1 करोड़ 4 लाख से अधिक हो सकती है।

ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की पहुंच अब भी कमजोर
विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या वृद्धि की तुलना में शिक्षा का विस्तार समान गति से नहीं हो पाया है। ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में स्कूलों की पहुंच, शिक्षकों की उपलब्धता और जागरूकता की कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

शहरी जिलों में भी पूरी तरह सुधार नहीं
राजधानी रायपुर और बिलासपुर जैसे जिलों में भी निरक्षरता के आंकड़ों में वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषकर बिलासपुर और कबीरधाम में स्थिति अपेक्षा से कमजोर बनी हुई है, जिससे शहरी शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

कुछ जिलों में दिखा सुधार
हालांकि कुछ जिलों में सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। दुर्ग जिले में निरक्षरता में कमी दर्ज की गई है। कोरबा, दंतेवाड़ा, धमतरी और बालोद जैसे जिलों में भी शिक्षा के स्तर में सुधार के संकेत मिले हैं, जहां योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन हुआ है।

नए जिलों में चुनौतियां अधिक
राज्य के नए और विकसित हो रहे जिलों में अभी भी स्कूलों की कमी, शिक्षकों की कमी और जागरूकता का अभाव बड़ी समस्या बना हुआ है। इन क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए विशेष रणनीति की जरूरत बताई जा रही है।

आगे की राह: समान शिक्षा पहुंच सबसे बड़ी जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और जागरूकता पर भी समान रूप से ध्यान देना जरूरी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

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