मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना पर उठे सवाल : तीन साल में सूख गए 9 लाख पौधे, जमीनी हकीकत ने खोली दावों की पोल

CG Plantation Project: मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना के तहत 9 लाख रुपये खर्च कर लगाए गए पौधे सूखे, मोहला-मानपुर के पिपरखार गांव से सामने आई जमीनी हकीकत
छत्तीसगढ़ के मोहला-मानपुर जिले के ग्राम पिपरखार में मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना की स्थिति सवालों के घेरे में है। जहां साल 2022 में करीब 9 लाख रुपये खर्च कर लगाए गए पौधे अब सूख चुके हैं।
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तीन साल बाद जब योजना की जमीनी स्थिति सामने आई तो हरियाली की जगह वीरानी दिखाई दी। ऐसे में मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना के क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
लाखों रुपये खर्च, लेकिन नहीं बच सके पौधे
अंबागढ़ चौकी विकासखंड के ग्राम पिपरखार में मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना के तहत बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया गया था। योजना के तहत पौधों की सुरक्षा के लिए फेंसिंग, सिंचाई और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं भी बनाई गई थीं।
स्थानीय स्तर पर इस परियोजना को पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया गया था। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है।
अधिकांश पौधे सूख चुके हैं और जिस भूमि को हरा-भरा होना था, वहां अब खाली और उजाड़ क्षेत्र दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना के लिए खर्च की गई राशि और मौजूदा परिणामों के बीच का अंतर ग्रामीणों को भी हैरान कर रहा है।
रखरखाव की कमी बनी बड़ी वजह
स्थानीय लोगों का कहना है कि पौधारोपण के शुरुआती चरण के बाद देखरेख पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। पौधों को नियमित पानी नहीं मिला और समय के साथ सिंचाई व्यवस्था भी बंद हो गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि निगरानी और संरक्षण की व्यवस्था लगातार बनी रहती तो पौधों को बचाया जा सकता था। मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखते हुए विकसित करना भी था।
लेकिन पिपरखार में योजना का यह महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद जमीन पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिख रहे हैं।
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ग्राम पंचायत और विभागीय जिम्मेदारी पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि योजना की कार्य एजेंसी ग्राम पंचायत के जिम्मेदार भी वृक्षारोपण को सफल नहीं मान रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय स्तर पर भी योजना की स्थिति को लेकर चिंता है।
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दूसरी ओर जब वन विभाग के अधिकारियों से इस बदहाली को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने सीधे जवाब देने के बजाय विभाग की अन्य योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी देना अधिक उचित समझा।
ऐसे में मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना की निगरानी, मूल्यांकन और जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सार्वजनिक धन खर्च हुआ है तो उसके परिणामों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
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अब उठ रहे जवाबदेही और जांच के सवाल
पिपरखार की यह तस्वीर केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं की प्रभावी निगरानी की आवश्यकता को भी सामने लाती है।
ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मानना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पौधे क्यों नहीं बच पाए और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
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मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना का उद्देश्य हरियाली बढ़ाना था, लेकिन वर्तमान हालात में योजना की सफलता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि संबंधित विभाग और प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या व्यवस्था बनाई जाती है।







