केलो नदी में बढ़ता प्लास्टिक कचरा बना चिंता का विषय, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगी जवाबदेही

रायगढ़। शहर की जीवनरेखा मानी जाने वाली केलो नदी एक बार फिर प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे की समस्या से जूझ रही है। नगर निगम ने पिछले वर्ष की तरह इस बार भी नदी की सफाई के लिए चेन माउंटेन मशीनें लगाई हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या की जड़ पर कार्रवाई किए बिना स्थायी समाधान संभव नहीं है।
हाईकोर्ट ने उठाए सिंगल यूज प्लास्टिक के स्रोत पर सवाल
हाल ही में हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सिंगल यूज प्लास्टिक और नॉन-बायोडिग्रेडेबल सामग्री के उपयोग पर गंभीर चिंता जताई गई। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष प्रश्न रखा कि कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों और ठेला व्यवसायियों पर की जाती है, जबकि प्लास्टिक का निर्माण और बड़े स्तर पर आपूर्ति करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।
अदालत ने राज्य सरकार और पर्यावरण संरक्षण मंडल को निर्देश दिए हैं कि सिंगल यूज प्लास्टिक के स्रोतों की पहचान कर निर्माताओं और बड़े सप्लायरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही सड़क, बाजार, नालियां, जल स्रोत, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक स्थलों को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए विशेष अभियान चलाने को कहा गया है।
नगर निगम की कार्रवाई, लेकिन सवाल बरकरार
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगम ने शहर की दर्जनभर दुकानों में जांच कर जुर्माना लगाया है। हालांकि अब तक सिंगल यूज प्लास्टिक के निर्माण और बड़े सप्लाई नेटवर्क पर ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। अदालत ने अगली सुनवाई में मुख्य सचिव से कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
केलो नदी में लगातार पहुंच रहा घरेलू कचरा
केलो नदी में घरेलू गंदे पानी, प्लास्टिक कचरे और जलकुंभी जैसी समस्याओं के कारण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। शहर के कई नालों के माध्यम से कचरा सीधे नदी में पहुंच रहा है। नदी किनारे स्थित बस्तियों से भी बड़ी मात्रा में ठोस अपशिष्ट नदी में डाला जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर नालों में लगी स्क्रीन प्लास्टिक कचरे से भर चुकी हैं, लेकिन समय पर उनकी सफाई नहीं की जाती। भारी बारिश के दौरान यही कचरा बहकर सीधे नदी में पहुंच जाता है।
सफाई पर करोड़ों खर्च, फिर भी नहीं मिला स्थायी समाधान
देश के प्रदूषित नदीखंडों में शामिल केलो नदी को स्वच्छ बनाने के लिए वर्षों से योजनाएं चल रही हैं। दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाए गए हैं, लेकिन नदी में गिरने वाले कचरे और प्रदूषित पानी को पूरी तरह रोकने में सफलता नहीं मिल सकी है। पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि केवल सतही सफाई की बजाय कचरे के स्रोतों पर नियंत्रण और जनजागरूकता ही दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्लास्टिक कचरे के स्रोतों की पहचान कर प्रभावी कार्रवाई करना है। यदि निर्माण और सप्लाई स्तर पर रोक नहीं लगाई गई, तो केलो नदी को प्रदूषण से मुक्त करना मुश्किल बना रहेगा। नदी संरक्षण और स्वच्छता को लेकर आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।







