रायगढ़ में शांति समिति की बैठकें या महज औपचारिकता? त्योहारों में सड़कों पर जनता का हक क्यों सिकुड़ जाता है!

पंडाल, भंडारे और अव्यवस्थित पार्किंग से आम नागरिक परेशान; निर्देश जारी करने से नहीं, उनका पालन कराने से साबित होती है प्रशासन की जिम्मेदारी
रायगढ़। लोकतंत्र में सड़क किसी की निजी जागीर नहीं, बल्कि आम जनता की आवाजाही का सार्वजनिक रास्ता है। यह न किसी पंडाल के विस्तार के लिए है, न भंडारे का परिसर बनाने के लिए और न ही आयोजकों की सुविधा के नाम पर घेर लेने के लिए। लेकिन रायगढ़ में त्योहार आते ही सार्वजनिक सड़कों पर आम नागरिकों का अधिकार सिमटता नजर आता है। कहीं पंडाल सड़क तक फैल जाते हैं, कहीं भंडारे के नाम पर रास्ता घेर लिया जाता है, तो कहीं पार्किंग की अव्यवस्था पूरे मार्ग को जाम में बदल देती है। नतीजा यह कि लोगों को अपने ही शहर में आने-जाने के लिए जूझना पड़ता है, जबकि व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी जिन पर है, उनकी सक्रियता अक्सर निर्देश जारी करने तक सीमित दिखाई देती है।
हर बार बैठक, हर बार निर्देश… फिर सड़क पर वही हाल क्यों?
हर बड़े आयोजन और त्योहार से पहले जिला प्रशासन शांति समिति की बैठक बुलाता है। ध्वनि विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल, रात साढ़े दस बजे के बाद ध्वनि बंद करने, भीड़ नियंत्रण और पार्किंग व्यवस्था जैसे मुद्दों पर निर्देश दिए जाते हैं। आयोजकों से नियमों का पालन करने की अपेक्षा भी की जाती है। मगर सवाल यह है कि बैठक खत्म होने के बाद इन निर्देशों का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है?
त्योहार शुरू होते ही कई स्थानों पर पुरानी अव्यवस्थाएं फिर सामने आने लगती हैं। सड़क पर पंडाल और आयोजन सामग्री फैल जाती है, भंडारे के लिए रास्ते का इस्तेमाल होने लगता है और वाहनों की बेतरतीब पार्किंग से आवागमन प्रभावित होता है। ऐसे में शांति समिति की बैठकों का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
बैठक बुलाना प्रशासनिक जिम्मेदारी का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे व्यवस्था कायम होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। निर्देश जारी करना और उनका पालन सुनिश्चित करना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि हर साल, हर त्योहार और हर बड़े आयोजन में वही समस्याएं दोहराई जाती हैं, तो यह पूछना जरूरी है कि आखिर इन बैठकों से हासिल क्या हो रहा है?
जिम्मेदारी केवल आयोजकों की नहीं, प्रशासन की भी
सार्वजनिक सड़कों को बाधित होने से बचाना केवल आयोजकों की जिम्मेदारी बताकर प्रशासन अपनी भूमिका से अलग नहीं हो सकता। आयोजनों की अनुमति देने से लेकर स्थल निरीक्षण, पार्किंग की जगह निर्धारित करने, भीड़ प्रबंधन की योजना बनाने और यातायात सुचारु रखने तक प्रशासन की सक्रिय भूमिका जरूरी है।
यदि किसी आयोजन से पहले ही यह स्पष्ट कर दिया जाए कि पंडाल कहां तक लगेगा, पार्किंग कहां होगी और आपातकालीन आवागमन का रास्ता कैसे खुला रखा जाएगा, तो कई समस्याओं को समय रहते रोका जा सकता है। इसके विपरीत, यदि नियमों के उल्लंघन के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो निर्देशों का प्रभाव कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।
त्योहारों में धार्मिक और सामाजिक आयोजनों का अपना महत्व है। भंडारे, पूजा-पंडाल और सांस्कृतिक कार्यक्रम जनभागीदारी और आस्था के प्रतीक हैं। लेकिन किसी आयोजन की भव्यता आम नागरिकों की परेशानी की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। आस्था का सम्मान जरूरी है, पर सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों की अनदेखी करके नहीं।
शांति समिति की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी
शांति समिति का उद्देश्य त्योहारों के दौरान शांति, सुरक्षा और नागरिक सुविधाएं सुनिश्चित करना है। लेकिन जब बैठकों में बार-बार वही निर्देश दिए जाएं और आयोजनों के दौरान वही समस्याएं सामने आएं, तो समिति की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या प्रशासन के लिए इतना ही पर्याप्त है कि बैठक हो गई, निर्देश जारी कर दिए गए और जिम्मेदारी आयोजकों पर छोड़ दी गई? या फिर यह भी जरूरी है कि फैसलों की निगरानी हो, नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जाए और आम लोगों को उसका असर दिखाई दे?
शांति समिति को भंग करने की मांग या सवाल को इसी विफलता पर एक तीखे कटाक्ष के रूप में देखा जा सकता है। किसी समिति का औचित्य उसके नाम, बैठक की तस्वीर या कार्यवाही के दस्तावेज से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से तय होता है। यदि बैठकों के बावजूद सार्वजनिक सड़कों पर अव्यवस्था कायम रहती है, तो केवल बैठकें आयोजित करते रहने से व्यवस्था सुधरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
त्योहारों की रौनक बनी रहे, लेकिन जनता का रास्ता न रुके
रायगढ़ में जरूरत त्योहारों और आयोजनों पर रोक लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने की है। प्रशासन को बैठक में दिए गए निर्देशों को धरातल पर लागू कराने के लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। आयोजन स्थलों का निरीक्षण, पार्किंग की पूर्व व्यवस्था, यातायात की निगरानी और नियमों के उल्लंघन पर निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है।
आयोजकों को भी यह समझना होगा कि सार्वजनिक सड़क पर पहला अधिकार आम नागरिकों की आवाजाही का है। धार्मिक या सामाजिक आयोजन के नाम पर रास्ता बाधित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
आखिरकार, शांति समिति की असली सफलता बैठक आयोजित करने में नहीं, बल्कि त्योहारों के दौरान शहर में शांति, सुरक्षा और सुचारु आवागमन बनाए रखने में है। अगर जनता को हर बार जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और घिरी हुई सड़कों से जूझना पड़े, तो प्रशासन को आत्ममंथन करना ही चाहिए। सवाल सीधा है—रायगढ़ में शांति समिति की बैठकें व्यवस्था बदलने के लिए होती हैं या सिर्फ यह दिखाने के लिए कि व्यवस्था बनाने की कोशिश की गई थी?






