जयशंकर की अमेरिका यात्रा: खनिज, ऊर्जा और व्यापार की नई वैश्विक शतरंज

बदलती वैश्विक राजनीति के बीच अहम दौरा
विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अमेरिका यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और व्यापारिक टकराव एक-दूसरे में गहराई से उलझ चुके हैं। यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संवाद नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की भूमिका को फिर से परिभाषित करने की कोशिश मानी जा रही है।
खनिज, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा पर केंद्रित एजेंडा
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की पहल पर आयोजित महत्वपूर्ण खनिजों की मंत्री स्तरीय बैठक में जयशंकर की भागीदारी इस ओर इशारा करती है कि आने वाला दशक खनिज संसाधनों, सेमीकंडक्टर आपूर्ति और स्वच्छ ऊर्जा के इर्द-गिर्द केंद्रित रहेगा। यह वही क्षेत्र हैं, जो भविष्य की वैश्विक शक्ति राजनीति तय करेंगे।
दुर्लभ खनिज: आर्थिक नहीं, सामरिक मुद्दा
जयशंकर की यात्रा का पहला और स्पष्ट लक्ष्य महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना है। अब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं यह मानने लगी हैं कि दुर्लभ खनिज केवल व्यापार का विषय नहीं, बल्कि सीधा सामरिक प्रश्न बन चुके हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उपकरण और हाई-टेक उद्योग इन पर निर्भर हैं।
चीन निर्भरता घटाने में भारत बना भरोसेमंद विकल्प
चीन जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की वैश्विक कोशिशों में भारत को एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। भारत की खनिज संपदा, विशाल घरेलू बाजार और तेजी से बढ़ती तकनीकी मांग उसे इस रणनीतिक खेल का केंद्रीय खिलाड़ी बनाती है।
सात महीने बाद अमेरिका दौरा, बदला हुआ माहौल
यह जयशंकर की सात महीनों बाद पहली द्विपक्षीय अमेरिका यात्रा है। पिछली यात्रा ऐसे समय हुई थी, जब भारत-अमेरिका संबंध अपेक्षाकृत सहज थे और शुल्क तनाव नहीं था। इन महीनों में वैश्विक समीकरण तेजी से बदले हैं।
ट्रंप कार्यकाल में टैरिफ बना कूटनीतिक हथियार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद टैरिफ को खुले तौर पर दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया। भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क और रूस से तेल खरीद को लेकर लगाए गए दंडात्मक टैक्स ने द्विपक्षीय संबंधों में खटास पैदा की।
नरमी के संकेत और सौदेबाजी की नई ज़मीन
अब वाशिंगटन से नरमी के संकेत मिलने लगे हैं। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि यदि भारत रूस से तेल खरीद घटाता है, तो अतिरिक्त शुल्क हटाने का रास्ता खुल सकता है। साथ ही वेनेजुएला से तेल खरीद दोबारा शुरू करने की अनुमति के संकेत भी दिए गए हैं।
ऊर्जा से आगे की कूटनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल ऊर्जा नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वार्ता की मेज पर रखे गए कूटनीतिक पत्ते हैं। जयशंकर की यह यात्रा इसी सौदेबाजी में भारत के हितों को संतुलित करने की कोशिश मानी जा रही है।












