लाकडाऊन में फंसे मजदूरों की सम्मान जनक घर वापसी का न होना पूंजीपतियों और सरकार की सोंची समझी साजिश-राजेश त्रिपाठी

सिंहघोष/रायगढ:- देश मे कोरोना संक्रमण के मद्दे नजर जिस दिन से केन्द्र सरकार ने बिना तैयारी के अकस्मात आगामी 21 दिन के सम्पूर्ण लाकडाऊन की घोषणा की थी,उसी दिन से यह समझ मे आ गया था कि इस देश बन्दी की बुरी मार दिहाड़ी मजदूरों और कामगार श्रमिको पर पड़ने वाली है।। इस पर बचा खुचा कसर सरकार के कथित संरक्षण में पलने वाले आई टी सेल के लोगों ने पूरी कर दी।। इन्ही आईटी सेल वालों ने पूरे देश मे इस तरह का अफवाह फैला दी कि यह देशव्यापी लाकडॉऊन आगामी तीन से चार महीने तक कायम रहेगा।। परिणाम यह हुआ कि एक तरफ विश्वव्यापी महामारी कोरोना संक्रमण की आधी अधूरी तैयारियों के साथ सरकार लाकडाऊन के दुष्परिणामो को रोकने में लगी रही तो दूसरी तरफ सड़को पर श्रमिको,कामगारों और मजदूरों की भीड़ बदहवास सड़को,रेल्वे-स्टेशनों,बस स्टैंडों पर उमड़ पड़ी।।
सरकार कोरोना लॉकडाउन में पूरे भारत को घर में रहने को कहा गया. लेकिन लाकडाऊन के शुरुवाती 3 दिनों में हजारों की तादाद में मजदूर सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर पैदल मार्च करने के उद्देश्य से एक राज्य से दूसरे राज्य जाते देखे गए. ये वो ही दिहाड़ी मजदूर थे,जो रोजी-रोटी कमाने के लिए अपने-अपने गांवों से जाकर महानगरों में बस गए थे.इनमे से अधिकांश लोग स्थानीय उद्योगों में श्रमिक थे।। जिन्होने अपने खून पसीने से देश की अर्थव्यवस्था को अब तक गति दी थी।। अब ये लोग लाकडाऊन कि वजह से अचानक बन्द हुए उद्योगों से उपजी स्थिति के कारण वापस अपने राज्य की ओर जाने को मजबूर हो गए थे।। इनकी इस बदहाल दशा के लिए सरकारों की गैर जिम्मेदारियां तो दोषी थी ही साँथ ही लालची उद्योग प्रबंधनों की बदइंतजामी भी बराबरी की जिम्मेदार थी। पलायन करने वाले हजारों लाखों मजदूरों/श्रमिकों को अब लगने लगा था कि वो महानगरों में रहे तो अपना और अपने परिवार का पेट कैसे भरेंगे? बहुत से श्रमिको के सामने तो रहने का संकट भी खड़ा हो गया था।। उद्योगों में मिले अस्थाई आवास में बमुश्किल गुजर-बसर करने वाले श्रमिकों की कमाई(रोजगार) ही नहीं बल्कि उनका कोई ठिकाना भी नहीं बचा था.भारत में दिल्ली, मुंबई,हैदराबाद,बैंगलुरू,कोलकाता,अहमदाबाद में बड़े पैमाने पर मजदूर दूसरे राज्यों से आते हैं.ये मजदूर ज्यादातर बिहार,उत्तर प्रदेश,छत्तीसगड़,ओड़िसा,झारखण्ड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आते हैं. वहीं देश की एक बड़ी आबादी है जो रोजी-रोटी की तलाश में अपने गांव,अपने शहर को छोड़ती है.लाकडॉऊन के प्रथम चरण में सड़कों पर उमड़ी भीड़ ऐसे ही मजदूरों की थी।।जिनके प्रति देश की सरकारें औऱ सिस्टम दोनो ही अंसवेदशील और गैर जिम्मेदार बने रहे।।
परिणाम देश मे कोरोना संक्रमण से पीड़ितों और सड़कों पर उतरी श्रमिको की भूखी-प्यासी असुरक्षित भीड़ के बीच मौत की प्रतिस्पर्धा चल निकली।। काफी दिनों तक दोनो ही कारणों से मरने वालों की संख्या लगभग बराबर चलती रही।। शुरवाती दौर में हताश-निराश घर को पैदल लौटते श्रमिक और मजदूरों की भीड़ में से 53 मौतें सिर्फ थकावट,भूख,चिकित्सा सहायता की अनुपलब्धता अथवा भोजन या आजीविका के अभाव में हुई थी।। लगभग इतनी ही मौत कोरोना संक्रमण से हो चुकी थी।। दिनों-दिन दोनो तरफ के आंकड़े समानांतर रूप से बढ़ते रहे। इनमें से कुछ मौत तो लाकडाऊन के हिंसक पालन से हुई थी,आंकड़े बताते है कि देश भर में पुलिस की मार और भगदड़ से करीब सत्तर लोग मारे गए हैं।।
इधर काफी दिनों तक हाँथ में हाथ धरी बैठी सरकारें और उनका तंत्र आनन-फानन में घर लौटने के लिए प्रयासरत प्रवासी मजदूरों को शहरों या राजमार्गों में जिधर जहां पाया वहाँ बर्बरता से रोकने में कोई कसर नही छोड़ी।। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर भीड़ को अस्थाई कैम्पों में जानवरों की तरह रखा जाने लगा।। जो आज भी इसी अवस्था मे है।। इधर बदहवास लौटती श्रमिको की भीड़ राजमार्गों में भी तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर हुई दुर्घटनाओं बड़ी संख्या में मारी गई।। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कम से कम 65 प्रवासी मजदूरों की मौत सड़क हादसों में हो गई.जबकि भूख,थकान,बीमारी और हतासा से हुई मौतों को जोड़े तो यह आंकड़ा तकरीबन 450 के बीच बैठता है।। देश भर में कोरोना लाकडाऊन के प्रथम चरण और द्वितीय चरण के प्रारंभिक दिनों में कोरोना संक्रमण से भी लगभग 5 सौ लोग ही मारे गए है।।
राजेश त्रिपाठी जो जनचेतना से जुड़े प्रख्यात समाजिक कार्यकर्ता और तर्कशील बुद्धिजीवी वर्ग से है।।उनका कहना है कि लाकडाऊन के दौरान देश भर के उद्योंगो के कामगार/श्रमिक और सिविल कार्यों में दिहाड़ी कमाने खाने वाले लोगो को सुरक्षित घर न भेजने के पीछे देश के कुटिल बेईमान उद्योगपतियों के अलावा सरकार और उसका तंत्र बराबर का दोषी रहा है।। सरकारों आंकड़े कुछ सौ की मौतों पर टिकी हुई है जबकि वास्तविकता आप भी बेहतर ढंग से जानते है।। दूसरे शब्दों में केंद्र सरकार की अव्यवस्थित लाकडॉऊन की घोषणा और पूंजीपतियों और सरकार के बीच अघोषित तालमेल का परिणाम रही। दोनो को यह लगने लगा था कि भूखे-गरीब और मजबूर श्रमिक या मजदूर एक बार घर लौट गए तो आसानी से वापस नही आएंगे।। ऐसे में देश मे लाकडॉऊन खुलने के बाद उद्योगों और बड़े सिविल कार्यों को दोबारा से चालू करने के लिए मैन पावर की गम्भीर समश्या हो जाएगी।। अतः बिना तैयारी के देश के अंदर आवागमन के सभी साधन बन्द कर दिए गए।। इस बीच या इससे पूर्व हजारो-लाखों सम्पन्न अप्रवासी भारतीयों को विदेशों से सरकार ने अपने खर्चे पर वापस भारत लाया यही नही फिजिकल डिस्टेंसिंग को दर किनार करते हुए कोरोना संक्रमण के नियमों को धत्ता बताकर हरिद्वार में फंसे हजारों तीर्थयात्रियों की स्पेशल बस से गुजारत वापसी कराई गई।। दूसरी तरफ बिना सरकारी मदद के लगभग 10 प्रतिशत मजदूर ही अपने घर वापस लौटने का सफल-असफल प्रयास करते देखे गए।। बाकी बचे श्रमिकों और मज़दूरो को जो जहां रोकते बना उसे सीमित या बिलकुल थोड़े संसाधनों के साँथ बस किसी तरह जिंदा रखने के लिए रोक लिया गया।। ताकि कोरोना आपदा के बाद उद्योग-धंधों को दुबारा से इन्ही मजदूरों के बूते गति दी जा सके।। आज यह वर्ग अमानवीय दशा में एक साथ एक ही जगह पर कई राज्यों और शहरों भूखे प्यासे बमुश्किल जिंदगी की जरूरतों के लिए संघर्ष करता हुआ कोरोना महामारी के संक्रमण की सम्भावनाओं के बीच नरकीय जीवन जीने को मजबूर है। आज अकेले रायगढ जिले और शहर में देश बन्दी में फंसे अप्रवासी मजदूरों की संख्या हजारों में है।। वही स्थानीय उद्योंगो में वो किस दशा में कैसे रह रहे है यह आपसे हमसे छुपा नही है।।











