रायगढ़

समय से बड़ी कोई संपत्ति नहीं, भक्ति ही मुक्ति का सहज मार्ग : बाबा प्रियदर्शी राम

Advertisement

श्याम मंडल के पांच दिवसीय कृष्ण जन्मोत्सव का दिव्य शुभारंभ, आशीर्वचन में मानव जीवन के उद्देश्य पर डाला प्रकाश

रायगढ़। श्याम मंडल द्वारा आयोजित पांच दिवसीय श्रीकृष्ण जन्मोत्सव एवं झांकियों का शुभारंभ अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट, बनोरा के संस्थापक पूज्यपाद अघोर संत बाबा प्रियदर्शी राम जी के करकमलों से भक्तिमय वातावरण में हुआ। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, श्याम मंडल के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस अवसर पर बाबा प्रियदर्शी राम जी ने मानव जीवन, समय के सदुपयोग, ईश्वर भक्ति, परोपकार और कर्मयोग को लेकर श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन दिया।

झांकियां सनातन परंपरा की जीवंत पाठशाला

अपने आशीर्वचन में बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्म से जुड़ी झांकियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की जीवंत पाठशाला हैं। इनके माध्यम से नई पीढ़ी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के साथ धर्म, त्याग और समर्पण के प्रसंगों को सहजता से समझ सकती है।

उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण और श्याम बाबा से जुड़े त्याग एवं शीश दान जैसे प्रसंग जीवन में समर्पण और धर्म के महत्व को समझाने वाले हैं। ऐसी धार्मिक एवं शिक्षाप्रद झांकियां युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करती हैं।

मनुष्य पारस छोड़कर कांच के टुकड़े बटोर रहा

बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा कि मनुष्य का जीवन ईश्वर की श्रेष्ठतम देन है। यही शरीर स्वर्ग, नर्क और मोक्ष की ओर जाने का माध्यम बन सकता है, लेकिन विडंबना है कि ज्ञानवान होने के बावजूद मनुष्य भक्ति के बजाय भोग-विलास और धन संचय में अपना जीवन खपा देता है।

उन्होंने कहा कि यह स्थिति ऐसी है, जैसे कोई व्यक्ति पारस मणि को फेंककर कांच के टुकड़े बटोरने लगे। मनुष्य धन, संपत्ति, मकान और जमीन जुटाने में जीवन का बहुमूल्य समय खर्च कर देता है, लेकिन जीवन के अंतिम क्षणों में अर्जित संपत्ति के बदले वह अपना बीता हुआ एक पल भी वापस नहीं खरीद सकता।

समय ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी

बाबा जी ने कहा कि समय संसार की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। समय का सदुपयोग मनुष्य को आत्मकल्याण और मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाता है, जबकि उसका दुरुपयोग जीवन को भटकाव की ओर ले जाता है।

उन्होंने कहा कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। मनुष्य जानता है कि एक दिन संसार के सभी रिश्ते पीछे छूट जाएंगे, फिर भी वह परमात्मा से अपना संबंध मजबूत करने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं करता। उन्होंने श्याम बाबा के भक्तों से पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ ईश्वर से संबंध जोड़ने का आह्वान किया।

परोपकार में अहंकार नहीं, सेवा भाव जरूरी

बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा कि परोपकार मनुष्य का कर्तव्य है, लेकिन सेवा करते समय अहंकार का भाव नहीं आना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरों की सहायता करने की शक्ति भी परमात्मा की ही देन है। जब मनुष्य इस तथ्य को भूलकर अपने उपकार का अहंकार करने लगता है, तो लोभ, मोह, ईर्ष्या और घृणा जैसी प्रवृत्तियां उसे घेर लेती हैं।

उन्होंने कहा कि निःस्वार्थ सेवा और परोपकार से ही मन, चित्त और अंतःकरण की शुद्धि होती है। निर्मल और छल-कपट से रहित मन ही ईश्वर के निकट पहुंच सकता है।

60 वर्ष के बाद सेवा और वानप्रस्थ का समय

बाबा जी ने जीवन के विभिन्न चरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को धन अर्जित करने की भी एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए। 60 वर्ष की आयु के बाद का समय वानप्रस्थ, सेवा, परोपकार और ईश्वर भक्ति के लिए समर्पित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि असीमित धन की लालसा जीवन में शांति नहीं, बल्कि तनाव और अशांति पैदा करती है। धन कमाते समय शील और शालीनता का मार्ग अपनाना चाहिए तथा अर्जित धन का उपयोग जरूरतमंदों की सहायता और समाज के कल्याण में किया जाना चाहिए।

शांति बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर मौजूद

आत्मकल्याण की चर्चा करते हुए बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा कि मनुष्य जिस शांति की तलाश बाहर करता है, उसका वास्तविक स्रोत उसके भीतर ही मौजूद है। प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा का अंश विद्यमान है। स्वयं को पहचानना और उस दिव्य शक्ति को समझना जीवन के कल्याण के लिए आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि ईश्वर की भक्ति मनुष्य को सांसारिक क्लेशों से उबारने का सहज मार्ग है। प्रेम और भक्ति अंतःकरण को निर्मल करने वाले पवित्र माध्यम हैं, जबकि मनुष्य का भ्रम ही उसे परमात्मा से दूर रखता है।

जनकल्याणकारी कर्म ही सच्चा कर्मयोग

गीता के कर्मयोग का उल्लेख करते हुए बाबा जी ने कहा कि कर्म तो प्रत्येक व्यक्ति करता है, लेकिन जिस कर्म से समाज और जनकल्याण होता है, वही वास्तविक कर्मयोग बन जाता है। उन्होंने मनुष्य को अपनी पहचान नश्वर शरीर के बजाय आत्मस्वरूप से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि निष्काम भाव से किया गया कर्म ही जीवन को सार्थक बनाता है। दूसरों के कल्याण में खर्च किया गया धन व्यक्ति को ऐसा आत्मिक संतोष देता है, जिसे सांसारिक संपत्ति से खरीदा नहीं जा सकता।

दिखावे की जगह जरूरतमंदों की मदद का आह्वान

बाबा प्रियदर्शी राम जी ने आधुनिक जीवनशैली पर भी विचार रखते हुए कहा कि जन्मदिन और सालगिरह जैसे आयोजनों में अनावश्यक धन खर्च करने के बजाय समाज के जरूरतमंद लोगों की सहायता की जानी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में सहयोग जैसे कार्यों को प्राथमिकता देने की बात कही।

उन्होंने कहा कि स्वयं पर खर्च किया गया धन कुछ समय के लिए शारीरिक सुख दे सकता है, लेकिन दूसरों के जीवन में खुशियां लाने के लिए खर्च किया गया धन लंबे समय तक आत्मिक संतोष प्रदान करता है।

धन भोगें या न भोगें, कर्मफल से बचना संभव नहीं

बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन-संपत्ति अर्जित करता है, लेकिन वह उस संपत्ति का पूरा सुख भोग पाए या नहीं, यह निश्चित नहीं है। हालांकि धन अर्जित करने के दौरान किए गए कर्मों का फल उससे अलग नहीं होता।

उन्होंने कहा कि शास्त्रों में प्रत्येक कर्म को शुचिता और सद्भाव के साथ करने की सीख दी गई है। इसलिए धन अर्जन हो या सेवा, हर कार्य में नैतिकता और धर्म का पालन आवश्यक है।

धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर का अवतरण

अपने आशीर्वचन के समापन पर बाबा जी ने कहा कि जब-जब धर्म की हानि और अन्याय की वृद्धि हुई, तब-तब परमात्मा ने विभिन्न रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा की। भगवान राम और भगवान कृष्ण के जीवन से शांति, प्रेम, धर्म और मानव कल्याण का संदेश मिलता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से ईश्वर के सभी स्वरूपों के प्रति सम्मान रखने और अपने जीवन को भक्ति, सेवा, परोपकार तथा सद्कर्मों से जोड़ने का आह्वान किया।

Advertisement
Advertisement

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button