जमीन सौदे को लेकर नलवा स्टील एंड पावर विवादों में, 25 लाख अतिरिक्त मुद्रांक शुल्क चुकाने का आदेश

रायगढ़ । ओपी जिंदल ग्रुप की ब्लूचिप कंपनी नलवा स्टील एंड पावर लिमिटेड एक जमीन विवाद को लेकर सुर्खियों में है। मामला कंपनी परिसर के भीतर स्थित 2.4 हेक्टेयर भूमि की खरीदी-बिक्री से जुड़ा है। यह जमीन प्लांट के डायरेक्टर सरदार सिंह राठी ने नलवा स्पेशल स्टील लिमिटेड को बेची। हालांकि, इस सौदे में जमीन का मूल्यांकन कृषि भूमि के रूप में किया गया था, जबकि मौके पर जांच में पाया गया कि जमीन पर शेड, मशीनरी और अन्य औद्योगिक संरचनाएं मौजूद हैं। वास्तविक मूल्यांकन होने पर 25 लाख रुपये से अधिक का अतिरिक्त मुद्रांक शुल्क जमा करने का आदेश दिया गया।
भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर सवाल
जानकारी के मुताबिक, औद्योगिक परियोजनाओं के लिए सरकार एमओयू करने के बाद उद्योग विभाग और एसडीएम के जरिए भूमि अर्जित करती है और फिर सीएसआईडीसी जरूरत के अनुसार कंपनी को लीज पर देती है। इसके बावजूद कंपनियां अपने कर्मचारियों के नाम पर निजी तौर पर भी बड़ी मात्रा में जमीनें खरीद लेती हैं।
तराईमाल परिसर के अंदर खसरा नंबर 141/5/घ/1 (कुल रकबा 15.5970 हेक्टेयर) भूमि नलवा स्पंज आयरन प्रालि तराईमाल के नाम पर दर्ज है, लेकिन वास्तव में इसका मालिकाना हक रामदुलार गुप्ता के नाम पर है। यही नहीं, उनके नाम पर 13 अन्य खसरा नंबरों की जमीनें भी दर्ज हैं, जिन्हें औद्योगिक प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। इसी खसरे से 2.4 हेक्टेयर भूमि नलवा स्टील एंड पावर लिमिटेड के डायरेक्टर सरदार सिंह राठी ने नलवा स्पेशल स्टील लिमिटेड के डायरेक्टर मुकेश डालमिया को बेची।
स्टाम्प शुल्क में गड़बड़ी उजागर
जमीन की रजिस्ट्री में इसका मूल्य 4,15,70,500 रुपये आंका गया और इस पर 27,43,653 रुपये मुद्रांक शुल्क जमा किया गया। उप पंजीयक घरघोड़ा ने स्थल निरीक्षण कर इस प्रकरण की जानकारी जिला पंजीयक को दी। इसके बाद कलेक्टर ऑफ स्टाम्प्स ने मामले को दर्ज कर पुनः मूल्यांकन किया।
पुनः आंकलन में पाया गया कि भूमि, उस पर निर्मित संरचना और मशीनरी की वास्तविक कीमत 7,96,47,112 रुपये है। इस हिसाब से कुल देय मुद्रांक शुल्क 52,56,715 रुपये होना चाहिए था। नतीजतन नलवा स्पेशल स्टील को 25,13,062 रुपये अतिरिक्त चुकाने का आदेश दिया गया।
बिना डायवर्शन औद्योगिक उपयोग
निरीक्षण में यह भी सामने आया कि प्लांट परिसर के भीतर खरीदी गई भूमि का औद्योगिक उपयोग बिना डायवर्शन कराए ही किया जा रहा था। 16 हेक्टेयर भूमि में से बेची गई 2.4 हेक्टेयर भूमि पर टिन शेड (3840 वर्गमीटर), प्रसाधन कक्ष (300 वर्गफुट), आउटर फर्श (29374 वर्गफुट), अंदर फर्श (41319 वर्गफुट), वेब्रिज कक्ष (216 वर्गफुट), बाउंड्रीवॉल (403 रनिंग मीटर), सीसी रोड, लैंड सॉइल फिलिंग और लिफ्ट मशीन जैसी संरचनाएं मौजूद थीं।
औद्योगिक उपयोग के कारण भूमि का मूल्य 4.01 करोड़ रुपये और निर्मित संरचना व मशीनरी का मूल्य 3.95 करोड़ रुपये आंका गया। यानी कृषि भूमि के बजाय इसे औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदा गया, लेकिन डायवर्शन की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी। यही वजह है कि मामला अब चर्चा और विवाद का विषय बन गया है।












