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आंबेडकर अस्पताल की ‘सांसें’ अटकीं, 2005 की मशीनों से मरीजों का इलाज! कबाड़ के भरोसे राजधानी रायपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था

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रायपुर। जिन डॉक्टरों ने कोरोना काल में अपनी जान हथेली पर रखकर मरीजों की जान बचाई, उनकी सेवाएं अब सवालों के घेरे में हैं। इसका मुख्य कारण स्वास्थ्य विभाग की मशीनरी का ध्वस्त होना है। अस्पतालों में न तो पर्याप्त चिकित्सक हैं और न ही जांच की मशीनें ठीक हालत में हैं। यह स्थिति प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी आंबेडकर अस्पताल की है। इसकी दीवारें तो मजबूत हैं, लेकिन इसके भीतर का तकनीकी ढांचा पूरी तरह खोखला हो चुका है। डॉक्टर इलाज करना चाहते हैं, लेकिन जिन हथियारों (मशीनों) से उन्हें बीमारी से लड़ना है, वे ही जंग खा रहे हैं।

छह साल बाद भी मशीनें नहीं बदलीं

तकनीक बदल गई, आंबेडकर अस्पताल वहीं खड़ा है। चिकित्सा विज्ञान में प्रतिदिन नई क्रांति आ रही है, लेकिन अस्पताल का समय जैसे छह साल पहले थम गया है। पिछले छह वर्षों में यहां एक भी आधुनिक बड़ी मशीन की खरीद नहीं हुई है। रेडियोलॉजी और रेडियोथेरेपी जैसे विभाग, जो किसी भी अस्पताल की रीढ़ होते हैं, आज आउटडेटेड तकनीक के सहारे चल रहे हैं। डॉक्टर मजबूर हैं कि वे उन रिपोर्टों के आधार पर इलाज करें, जिनकी गुणवत्ता पर अब खुद मशीनों की एक्सपायरी डेट सवाल खड़े कर रही है।

मरीजों की जान से खिलवाड़

डायग्नोसिस में देरी यानी इलाज में देरी। अस्पताल के भीतर का मंजर डराने वाला है। जिस दौर में एआई से जांच हो रही है, वहां आंबेडकर अस्पताल के डॉक्टर 2005 और 2006 की मशीनों से बीमारी पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

एमआरआई और सीटी स्कैन

2012 में खरीदी गई मशीनें अब अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। मरीज बढ़ रहे हैं, मशीनें थक चुकी हैं और कतारें लंबी होती जा रही हैं।

एक्स-रे और सोनोग्राफी

पांच में से एक एक्स-रे मशीन दम तोड़ चुकी है, बाकी चार ओवरटाइम कर रही हैं। सोनोग्राफी मशीनें 18 साल पुरानी, वर्ष 2005 की हैं, जिनसे सटीक जांच की उम्मीद करना बेमानी है।

गंभीर परिणाम

कैंसर जैसे संवेदनशील मामलों में, जहां एक-एक क्षण कीमती होता है, वहां लीनियर एक्सीलेरेटर जैसी मशीनों का पुराना होना मरीजों को निजी अस्पतालों की महंगी चौखट पर धकेल रहा है।

बजट के आंकड़ों में उलझीं सांसें

विडंबना यह है कि फाइलें दौड़ रही हैं, लेकिन मशीनें नहीं पहुंच रही हैं। प्रबंधन ने अस्पताल को हाईटेक बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये का खाका खींचा था, लेकिन सरकार की ओर से सिर्फ 94.5 करोड़ रुपये ही मिले। अफसोस इस बात का नहीं कि बजट कम मिला, बल्कि इस बात का है कि स्वीकृत राशि के बावजूद कागजी कार्रवाई और टेंडर की पेचीदगियों ने नई मशीनों को अस्पताल की दहलीज तक पहुंचने नहीं दिया।

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