मां बनी जीवनदायिनी: किडनी दान कर 30 साल के बेटे को दिया नया जीवन

रायपुर। जीवनदायिनी मां ने किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे 30 साल के बेटे को अपनी किडनी के जरिए नया जीवन दिया। गंभीर बात यह थी कि ब्लड ग्रुप मेल नहीं खाता था। एम्स के नेफ्रोलॉजी सहित अन्य डॉक्टरों की टीम ने जटिलताओं से भरे इस प्रत्यारोपण को पूरा किया। ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक डाक्टरों की निगरानी मरीज और डोनर का
मरीज के पूरी तरह ठीक होने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई
समान रक्त समूह वाले डोनर नहीं मिलने पर चिकित्सकों की टीम ने एबीओ असंगत किडनी प्रत्यारोपण करने का फैसला लिया। सर्जरी के दौरान ब्लड ग्रुप अलग होने के कारण मरीज को पहले विशेष उपचार दिया गया। इसमें आटोइम्यून बीमारी को रोकने रिटुक्सिमैब दवा दी गई। पांच बार प्लाज्माफेरेसिस के जरिए खून से एंटीबॉडी हटाने की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी, एनेस्थीसिया और ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की टीम ने मिलकर इस गुर्दा प्रत्यारोपण को पूरा किया। प्रत्यारोपण सफल होने के बाद करीब दस दिन मरीज को आईसीयू में विभिन्न डाक्टरों की निगरानी में रखा। इसके बाद मरीज के पूरी तरह ठीक होने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई ।
सौ के करीब प्रत्यारोपण
राज्य में शासकीय स्तर पर किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा एम्स में है। इनके द्वारा ब्रेनडेड मरीजों से मिली 12 किडनी जरूरतमंद मरीजों को प्रत्यारोपित किया गया है। वहीं लाइव डोनरों के माध्यम से प्राप्त 95 किडनी मरीजों को ट्रांसप्लांट की चुकी है। राज्य में सबसे अधिक किडनी प्रत्यारोपण एम्स में किया।
एबीओ-इनकंपीटेबल बड़ा विकल्प
नेफ्रोलॉजी विभाग के डॉ. विनय राठौर ने बताया कि एबीओ-इनकंपीटेबल ट्रांसप्लांट उन मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प है, आमतौर पर लाइव किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान समान रक्त समूह के साथ नजदीकी रिश्तेदारों के डोनर होने के नियम का ख्याल रखा जाता है, जिन्हें उपयुक्त डोनर नहीं मिल पाता। डॉ. अमित शर्मा ने कहा कि इस तरह की सर्जरी में सही समय पर ऑपरेशन करना बेहद महत्वपूर्ण होता है।






