छत्तीसगढ़

गरियाबंद में मिली दुर्लभ ‘मंगोरा बाई’ मकड़ी, भारत में पहली बार दर्ज हुई मौजूदगी

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चीन में वर्ष 2021 में मिली थी इस प्रजाति की जानकारी, छत्तीसगढ़ के शोधकर्ताओं ने करीब एक महीने के अध्ययन के बाद की पहचान

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में दुर्लभ प्रजाति की ‘मंगोरा बाई’ (Mangora baii) मकड़ी की मौजूदगी दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भारत में इस प्रजाति का यह पहला वैज्ञानिक रिकॉर्ड है। इससे पहले वर्ष 2021 में चीन के युन्नान प्रांत में इस मकड़ी की मौजूदगी दर्ज की गई थी। गरियाबंद में इसकी पहचान से छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में मौजूद जैव विविधता और छोटे जीवों के अध्ययन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

शोधकर्ताओं को यह मकड़ी गरियाबंद जिला मुख्यालय से लगभग पांच किलोमीटर दूर गरियाबंद-देवभोग मार्ग के पास मिली। शुरुआत में इसकी प्रजाति की पहचान करना आसान नहीं था। इसके बाद शोध दल ने मकड़ी के शरीर की बनावट, रंग, धारियों और अन्य विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं का बारीकी से अध्ययन किया। इन विशेषताओं की तुलना चीन में वर्ष 2021 में प्रकाशित वैज्ञानिक शोध पत्रों में दिए गए विवरणों से की गई। करीब एक महीने की पड़ताल के बाद शोधकर्ताओं ने इसकी पहचान ‘मंगोरा बाई’ के रूप में की।

शरीर पर बनी विशिष्ट धारियों से हुई पहचान

शोधकर्ताओं के मुताबिक, मकड़ी के शरीर पर मौजूद खास निशान इसकी पहचान का प्रमुख आधार बने। इसके अंडाकार उदर पर चौड़ी काली धारियां दिखाई देती हैं। इसका सिर-वक्ष काले रंग का है, जबकि पैरों की बनावट भी इसे पहचानने में मदद करती है। उदर के निचले हिस्से में मौजूद चौड़ी, लंबवत रेखा भी इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

शोध दल ने इन सभी शारीरिक लक्षणों का चीन में प्रकाशित वैज्ञानिक विवरणों से मिलान किया। इसके बाद उपलब्ध वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर प्रजाति की पहचान की पुष्टि की गई। इस तरह गरियाबंद में मिली मकड़ी को भारत में इस प्रजाति की मौजूदगी के पहले वैज्ञानिक रिकॉर्ड के रूप में दर्ज किया गया।

चीन के बाद अब भारत में दर्ज हुई मौजूदगी

‘मंगोरा बाई’ की मौजूदगी वर्ष 2021 में चीन के युन्नान प्रांत में दर्ज की गई थी। अब गरियाबंद में इसकी पहचान होने से इस प्रजाति के भौगोलिक वितरण से संबंधित जानकारी का विस्तार हुआ है।

किसी जीव की मौजूदगी का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार होना जैव विविधता के दस्तावेजीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे संबंधित प्रजातियों के वितरण, प्राकृतिक आवास और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका को समझने के लिए आगे के शोध का आधार मिलता है। गरियाबंद में हुई यह खोज भी क्षेत्र की जैव विविधता के वैज्ञानिक अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

ऑर्ब-वीवर समूह से संबंधित है मकड़ी

‘मंगोरा बाई’ ऑर्ब-वीवर समूह की मकड़ी है। इस समूह की मकड़ियां सामान्यतः गोलाकार जाल बनाने के लिए जानी जाती हैं। मकड़ियां प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे छोटे कीटों का शिकार करके उनकी आबादी को नियंत्रित रखने में मदद करती हैं।

हालांकि, गरियाबंद में मिली इस विशेष प्रजाति के स्थानीय व्यवहार, भोजन, आवास और पर्यावरण में इसकी भूमिका को लेकर अभी विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है। आगे के शोध से इसके प्राकृतिक जीवन और क्षेत्र में इसके वितरण के बारे में अधिक जानकारी मिल सकती है।

छत्तीसगढ़ के शोधकर्ताओं ने किया अध्ययन

इस अध्ययन में छत्तीसगढ़ के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने योगदान दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शोध दल में डॉ. अविनाश आर. निचत, डॉ. के.के. हैरिस, जसवंत नायक और हितेश कुमार वारते शामिल रहे।

इस खोज से संबंधित अध्ययन 24 अक्टूबर को इंडियन जर्नल ऑफ नेचुरल साइंस में प्रकाशित होने की जानकारी दी गई है। वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से गरियाबंद में मिली मकड़ी की पहचान और भारत में उसकी मौजूदगी का रिकॉर्ड सामने आया है।

गरियाबंद के वन क्षेत्र में मिली यह दुर्लभ मकड़ी एक बार फिर दर्शाती है कि प्राकृतिक आवासों में मौजूद छोटे जीवों का व्यवस्थित अध्ययन जैव विविधता की नई जानकारियां सामने ला सकता है। इस तरह की खोजें वन्यजीवों के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर ढंग से समझने में सहायक होती हैं।

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