‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ की जरूरत पर उठे सवाल, क्या देश के भविष्य की पहली प्राथमिकता शिक्षा होनी चाहिए?

तिरंगे से लेकर शिक्षा व्यवस्था तक, राष्ट्रीय एकरूपता और सामाजिक समानता पर बहस तेज
नई दिल्ली। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में शिक्षा केवल रोजगार हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में ‘वन नेशन, वन टैक्स’ और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे विचारों के बीच अब ‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ यानी पूरे देश में समान गुणवत्ता वाली शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी बहस तेज हो रही है।
सवाल यह है कि क्या देश के हर बच्चे को, चाहे वह किसी महानगर में रहता हो या किसी दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्र में, समान स्तर की गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है?
शिक्षा व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी
भारतीय संविधान में शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया है। इसका मतलब है कि शिक्षा से जुड़े विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारें कानून और नीतियां बना सकती हैं। देश की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता को देखते हुए पूरी शिक्षा व्यवस्था को एक ही ढांचे में लागू करना आसान नहीं है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव का प्रयास किया गया है। हालांकि, पाठ्यक्रम, भाषा, प्रशासन और स्थानीय जरूरतों को लेकर राज्यों की अपनी प्राथमिकताएं होने के कारण देशभर में पूरी तरह समान शिक्षा व्यवस्था लागू करना अब भी चुनौती बना हुआ है।
शिक्षा पर खर्च को लेकर लगातार उठते रहे हैं सवाल
देश में शिक्षा पर सरकारी खर्च लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। कोठारी आयोग से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति तक शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता रहा है।
विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से यह मत रहा है कि शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 6 प्रतिशत खर्च किया जाना चाहिए। इसके मुकाबले केंद्र और राज्यों के संयुक्त सार्वजनिक व्यय को लेकर यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या मौजूदा निवेश देश की विशाल आबादी की शैक्षणिक जरूरतों के लिए पर्याप्त है?
सरकारी स्कूलों में घटता नामांकन बड़ी चिंता
सरकारी विद्यालयों की स्थिति भी शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को सामने रखती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्षों में सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की हिस्सेदारी में कमी आई है, जबकि निजी विद्यालयों की ओर विद्यार्थियों का रुझान बढ़ा है।
यह बदलाव केवल स्कूलों की संख्या का विषय नहीं है। इसके पीछे शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, बुनियादी सुविधाएं, अभिभावकों की अपेक्षाएं और स्थानीय परिस्थितियां जैसे कई कारण हो सकते हैं।
हजारों विद्यालयों के विलय और बंद होने का असर
सरकारी स्कूलों के विलय और पुनर्गठन की प्रक्रिया ने भी बहस को जन्म दिया है। छोटे विद्यालयों को एकीकृत करने के पीछे संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने का तर्क दिया जाता है।
दूसरी ओर, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालयों की दूरी बढ़ने से विद्यार्थियों, विशेषकर बालिकाओं, की शिक्षा तक पहुंच प्रभावित होने की चिंता भी व्यक्त की जाती रही है।
एकल शिक्षक विद्यालयों की चुनौती
देश के अनेक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी अब भी एक गंभीर समस्या है। बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं जहां सीमित शिक्षक कई कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी संभालते हैं।
ऐसी स्थिति में गुणवत्तापूर्ण और व्यक्तिगत ध्यान वाली शिक्षा उपलब्ध कराना कठिन हो सकता है। शिक्षक पदों की रिक्तियां भरना और प्रत्येक विद्यालय में आवश्यक संख्या में प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना शिक्षा सुधार की महत्वपूर्ण शर्त मानी जाती है।
प्रयोगशाला और इंटरनेट जैसी सुविधाओं में अंतर
आधुनिक शिक्षा केवल किताब और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं रह गई है। विज्ञान प्रयोगशालाएं, कंप्यूटर, इंटरनेट और डिजिटल संसाधन अब सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
इसके बावजूद कई सरकारी स्कूलों में अभी भी इन सुविधाओं की कमी देखने को मिलती है। ग्रामीण और शहरी विद्यालयों के बीच डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता का अंतर भी विद्यार्थियों के अवसरों को प्रभावित कर सकता है।
प्राथमिक से उच्च माध्यमिक तक पहुंच में गिरावट
शिक्षा व्यवस्था की एक अन्य बड़ी चुनौती विद्यार्थियों का स्कूल में टिके रहना है। शुरुआती कक्षाओं में नामांकन अपेक्षाकृत अधिक होने के बावजूद उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते विद्यार्थियों की संख्या में कमी आती है।
आर्थिक स्थिति, स्कूल की दूरी, पारिवारिक जिम्मेदारियां, शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार की तलाश जैसे कई कारण बच्चों के पढ़ाई छोड़ने के पीछे हो सकते हैं।
सीखने के स्तर को लेकर भी चिंता
केवल विद्यालय में नामांकन पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने, लिखने और गणितीय कौशल हासिल कर सकें।
विभिन्न शैक्षणिक सर्वेक्षणों में बुनियादी सीखने के स्तर को लेकर समय-समय पर चिंताएं सामने आती रही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा नीति का लक्ष्य केवल स्कूल तक पहुंच बढ़ाना नहीं, बल्कि सीखने के वास्तविक परिणामों में सुधार करना भी होना चाहिए।
क्या ‘एक शिक्षा’ का मतलब एक जैसा पाठ्यक्रम है?
‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ की अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या होगा।
यदि इसका अर्थ देश के हर बच्चे के लिए समान गुणवत्ता, समान अवसर, न्यूनतम समान शैक्षणिक मानक और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराना है, तो यह सामाजिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
लेकिन भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए स्थानीय भाषाओं, इतिहास और क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। इसलिए समान गुणवत्ता और स्थानीय विविधता के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
शिक्षा को चुनावी राजनीति से ऊपर रखने की जरूरत
शिक्षा में निवेश का परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता। सड़क, पुल या तात्कालिक राहत योजनाओं की तुलना में शिक्षा का प्रभाव कई वर्षों और पीढ़ियों में दिखाई देता है। यही कारण है कि शिक्षा नीति को दीर्घकालिक राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखने की जरूरत महसूस की जाती है।
यदि देश को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी समाज बनाना है, तो सरकारी विद्यालयों को मजबूत करना अनिवार्य होगा।
तिरंगा, राष्ट्र की पहचान और वैचारिक बहस
राष्ट्रीय पहचान से जुड़े प्रतीकों और संगठनों की वैचारिक भूमिका को लेकर भी सार्वजनिक बहस लंबे समय से होती रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के इतिहास को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं।
संघ मुख्यालय पर 2002 में लंबे अंतराल के बाद तिरंगा फहराए जाने की घटना को लेकर इतिहास और राजनीति में काफी चर्चा हुई। इसी व्यापक बहस में ‘हिंदू राष्ट्र’, राष्ट्रीय प्रतीक और संगठनात्मक विचारधारा जैसे विषय भी समय-समय पर उठते रहे हैं।
इन मुद्दों को समझने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों, संवैधानिक व्यवस्था और संबंधित संगठनों के आधिकारिक विचारों को अलग-अलग देखना जरूरी है, ताकि राजनीतिक आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट रहे।
संविधान और समान अवसर को केंद्र में रखना जरूरी
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता और अवसर के सिद्धांत से जोड़ता है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य यह होना चाहिए कि बच्चे की सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि उसकी शिक्षा की गुणवत्ता तय न करे।
एक गरीब परिवार का बच्चा और संपन्न परिवार का बच्चा यदि समान स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर सके, तो शिक्षा वास्तव में सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती है।
निष्कर्ष: देश का भविष्य कक्षाओं में तैयार होता है
भारत की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक आंकड़ों या भौतिक विकास से नहीं मापी जा सकती। किसी राष्ट्र की दीर्घकालिक ताकत उसके नागरिकों की शिक्षा, कौशल और सोच से तय होती है।
इसलिए जरूरत ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है जिसमें समान अवसर हो, गुणवत्तापूर्ण शिक्षक हों, पर्याप्त विद्यालय हों, आधुनिक सुविधाएं हों और बच्चों के सीखने पर वास्तविक ध्यान दिया जाए।
‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ की बहस का उद्देश्य यदि विविधता को समाप्त करना नहीं बल्कि हर बच्चे तक समान गुणवत्ता की शिक्षा पहुंचाना है, तो इस पर व्यापक और तथ्य आधारित राष्ट्रीय विमर्श होना जरूरी है।
राकेश प्रताप सिंह परिहार
राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति
पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कराने हेतु संघर्षरत






