रायगढ़

‘अमृत’ के दौर में लहूलुहान ‘कलम’: भारतीय लोकतंत्र के आहत प्रांगण से एक गद्य-क्रंदन

Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

15 अगस्त 2026 की सुबह | वर्ष में एक बार जब राजधानी का आकाश तिरंगे के रंगों से सजता है और सरकारी उद्घोषकों के कंठ से ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ की गाथाएं गूंजती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो हम न्याय, स्वतंत्रता और समानता के किसी अनाम स्वर्ग में विचर रहे हों।

लेकिन जैसे ही उत्सव की चमक फीकी पड़ती है, सड़कों पर पसरा सन्नाटा कई कड़वे सवाल हमारे सामने खड़ा कर देता है। संसद की दहलीज से लेकर राज्यों की चौखटों तक, जब कहीं किसी छात्र, युवा या नागरिक की आवाज अन्याय के विरुद्ध उठती है, तब लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।

आघात, अपमान और सत्ता का अहंकार

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो किसी भी दमनकारी व्यवस्था का पहला निशाना हमेशा प्रश्न पूछने वाला मन रहा है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है।

जब विरोध के स्वरों को दबाने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया जाता है और न्याय की गुहार लगाने वाले युवाओं या महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचती है, तो यह केवल व्यक्ति के शरीर पर लगी चोट नहीं होती—यह लोकतांत्रिक चेतना पर लगा घाव बन जाती है।

जहां तर्क की मृत्यु हो जाती है, वहां लाठी शासन करने लगती है। और जहां संवाद समाप्त हो जाता है, वहां सत्ता अपने कठोर रवैये को ‘कानून-व्यवस्था’ का नाम देने लगती है।

बेटियों की गरिमा और व्यवस्था से सवाल

जब किसी महिला की गरिमा, निजता या सम्मान को सार्वजनिक विवाद का हिस्सा बनाया जाता है और उसके परिवार को भय एवं मानसिक दबाव के दौर से गुजरना पड़ता है, तब केवल प्रशासनिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना भी सवालों के घेरे में आती है।

क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव और सत्ता परिवर्तन है? या फिर इसमें प्रत्येक नागरिक की गरिमा, सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?

वैचारिक दरिद्रता और लांछन की राजनीति

जब सत्ता के सामने उठे सवालों का उत्तर तर्क से नहीं दिया जाता, तो अक्सर आरोपों और लांछनों का सहारा लिया जाता है। किसी जागरूक नागरिक को ‘राष्ट्रविरोधी’ कहना या किसी संघर्षरत युवा को अपमानित करना समस्या का समाधान नहीं है।

लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले नागरिक को शत्रु नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने वाला नागरिक समझा जाना चाहिए।

राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदल देना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है।

लाठी बनाम तर्क

सत्ता डंडों से शरीर को चोट पहुंचा सकती है, लेकिन विचारों को समाप्त नहीं कर सकती। किसी आंदोलन को बलपूर्वक रोक देना आसान हो सकता है, लेकिन उसके पीछे उठे सवालों का समाधान किए बिना असंतोष को खत्म नहीं किया जा सकता।

सोशल मीडिया के अंधेरे कोनों से आने वाली धमकियां भी लोकतांत्रिक संवाद का विकल्प नहीं हो सकतीं। भय पैदा करके नागरिकों की आवाज को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।

आखिर स्वाधीनता के वास्तविक मायने क्या हैं?

यदि स्वाधीनता केवल संविधान के पन्नों तक सीमित हो जाए और लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार मतदान करने तक सिमट जाए, तो हमें अपने लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीरता से विचार करना होगा।

जिस दिन देश के युवाओं को अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष करते हुए भय का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिस दिन किसी महिला की आवाज को अपमान और दबाव के बीच अपनी जगह तलाशनी नहीं पड़ेगी—शायद उसी दिन हम स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ को और बेहतर ढंग से महसूस कर पाएंगे।

15 अगस्त का सूर्य हर वर्ष उगता है और ढल जाता है। तिरंगा हर वर्ष उसी गौरव के साथ लहराता है। राष्ट्रगान की धुन फिर सुनाई देती है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ केवल उत्सव नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकार, सम्मान और निर्भीकता की रक्षा भी है।

सच्चा लोकतंत्र कागज के पन्नों पर नहीं, बल्कि नागरिक के निर्भीक मन में सांस लेता है।

और जब वह मन न्याय की प्रतीक्षा में हो, तब स्वतंत्रता दिवस हमें केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का अवसर भी देता है।

लेखक : राकेश प्रताप सिंह परिहार
राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति
पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए संघर्षरत

Advertisement
Advertisement

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button