महंगाई की मार से किसानों की बढ़ी मुश्किलें, खेती की लागत 25 हजार रुपये प्रति एकड़ के पार

रायपुर। छत्तीसगढ़ में बढ़ती महंगाई ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खाद, बीज, डीजल-पेट्रोल, बिजली और मजदूरी की बढ़ती कीमतों ने खेती को पहले से कहीं अधिक महंगा बना दिया है। किसानों का कहना है कि अब खेती करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है और लागत बढ़ने से छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
खाद और उर्वरकों की किल्लत से बढ़ा खर्च
किसानों के अनुसार सोसाइटियों में डीएपी, यूरिया और पोटाश की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से उन्हें बाजार से महंगे दामों पर खरीदारी करनी पड़ रही है।
सोसाइटी में डीएपी का दाम 1350 रुपये प्रति बोरी है, जबकि बाजार में यही 2500 रुपये तक मिल रहा है।
इसी तरह यूरिया, जो सोसाइटी में 266 रुपये प्रति बोरी मिलती है, बाजार में 450 से 550 रुपये तक पहुंच गई है। पोटाश और अन्य दवाइयों की कीमतों में भी डेढ़ से दो गुना तक वृद्धि हुई है।
डीजल-पेट्रोल महंगा, जोताई से कटाई तक बढ़ी लागत
ईंधन की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर खेती पर पड़ा है। खेत की जुताई, सिंचाई, हार्वेस्टिंग और ट्रांसपोर्टिंग सभी महंगे हो गए हैं।
पिछले खरीफ सीजन में जहां हार्वेस्टिंग का खर्च लगभग 2 हजार रुपये प्रति एकड़ था, वहीं अब यह बढ़कर ढाई हजार रुपये तक पहुंच गया है।
रोपाई का खर्च भी बढ़ा
रोपाई के खर्च में भी भारी उछाल दर्ज किया गया है। पहले जहां प्रति एकड़ रोपाई में करीब 2 से 6 हजार रुपये खर्च होते थे, अब यह बढ़कर 7 से 8 हजार रुपये तक पहुंच गया है।
छोटे किसान कर्ज लेने को मजबूर
किसानों का कहना है कि पहले प्रति एकड़ धान की फसल तैयार करने में 15 से 17 हजार रुपये खर्च आता था, लेकिन अब यह बढ़कर 25 हजार रुपये से अधिक हो गया है। बढ़ती लागत के कारण छोटे किसानों को कर्ज लेना पड़ रहा है। यदि फसल खराब हो जाए या प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो उनकी पूरी पूंजी डूबने का खतरा बना रहता है।
खेती छोड़ने की नौबत
किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि महंगाई इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले समय में छोटे किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो सकते हैं। उनका कहना है कि खेती अब लाभ का नहीं, बल्कि जोखिम का सौदा बनती जा रही है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ में बढ़ती महंगाई ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खाद, बीज, डीजल-पेट्रोल, बिजली और मजदूरी की बढ़ती कीमतों ने खेती को पहले से कहीं अधिक महंगा बना दिया है। किसानों का कहना है कि अब खेती करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है और लागत बढ़ने से छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
खाद और उर्वरकों की किल्लत से बढ़ा खर्च
किसानों के अनुसार सोसाइटियों में डीएपी, यूरिया और पोटाश की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से उन्हें बाजार से महंगे दामों पर खरीदारी करनी पड़ रही है।
सोसाइटी में डीएपी का दाम 1350 रुपये प्रति बोरी है, जबकि बाजार में यही 2500 रुपये तक मिल रहा है।
इसी तरह यूरिया, जो सोसाइटी में 266 रुपये प्रति बोरी मिलती है, बाजार में 450 से 550 रुपये तक पहुंच गई है। पोटाश और अन्य दवाइयों की कीमतों में भी डेढ़ से दो गुना तक वृद्धि हुई है।
डीजल-पेट्रोल महंगा, जोताई से कटाई तक बढ़ी लागत
ईंधन की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर खेती पर पड़ा है। खेत की जुताई, सिंचाई, हार्वेस्टिंग और ट्रांसपोर्टिंग सभी महंगे हो गए हैं।
पिछले खरीफ सीजन में जहां हार्वेस्टिंग का खर्च लगभग 2 हजार रुपये प्रति एकड़ था, वहीं अब यह बढ़कर ढाई हजार रुपये तक पहुंच गया है।
रोपाई का खर्च भी बढ़ा
रोपाई के खर्च में भी भारी उछाल दर्ज किया गया है। पहले जहां प्रति एकड़ रोपाई में करीब 2 से 6 हजार रुपये खर्च होते थे, अब यह बढ़कर 7 से 8 हजार रुपये तक पहुंच गया है।
छोटे किसान कर्ज लेने को मजबूर
किसानों का कहना है कि पहले प्रति एकड़ धान की फसल तैयार करने में 15 से 17 हजार रुपये खर्च आता था, लेकिन अब यह बढ़कर 25 हजार रुपये से अधिक हो गया है। बढ़ती लागत के कारण छोटे किसानों को कर्ज लेना पड़ रहा है। यदि फसल खराब हो जाए या प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो उनकी पूरी पूंजी डूबने का खतरा बना रहता है।
खेती छोड़ने की नौबत
किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि महंगाई इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले समय में छोटे किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो सकते हैं। उनका कहना है कि खेती अब लाभ का नहीं, बल्कि जोखिम का सौदा बनती जा रही है।







