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छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन में रायगढ़ की ऐतिहासिक भूमिका, देवांगन धर्मशाला बनी थी आंदोलन की नींव

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छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन की कहानी संघर्ष, समर्पण और जनआवाज की कहानी है। आज भले ही छत्तीसगढ़ एक प्रगतिशील और सशक्त राज्य के रूप में विकसित हो चुका हो, लेकिन इसके पीछे लम्बा आंदोलन और जनसंघर्ष छिपा है। इस आंदोलन की नींव रायगढ़ शहर की देवांगन धर्मशाला में रखी गई ऐतिहासिक बैठक से पड़ी थी, जहां अलग राज्य की मांग की मशाल जली थी।

इस बैठक में रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ सहित प्रदेश के कई हिस्सों से नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए थे। इसमें चंदूलाल चंद्राकर, पुरुषोत्तम कौशिक, तिरूर भूषण, सुधीर मुखर्जी, हरि ठाकुर और केशव सिंह ठाकुर जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे। रायगढ़ से जगदीश मेहर, स्वर्गीय नंदकुमार पटेल और अन्य स्थानीय नेताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। बैठक का उद्देश्य था — छत्तीसगढ़ के लोगों को एकजुट कर आंदोलन को जनआंदोलन का रूप देना।

बैठक में यह तय हुआ कि हर जिले में स्थानीय नेता आंदोलन को गति देंगे और आम जनता को राज्य निर्माण के महत्व से अवगत कराएंगे। रायगढ़ जिले में यह जिम्मेदारी जगदीश मेहर और नंदकुमार पटेल को सौंपी गई। दोनों नेताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया, सभाएं कीं और अलग राज्य की आवश्यकता पर संवाद स्थापित किया।

1 नवंबर 2000 को पूरा हुआ सपना
जगदीश मेहर बताते हैं कि देवांगन धर्मशाला की वह बैठक इस बात का प्रतीक थी कि किसी भी बड़े परिवर्तन की शुरुआत जनता के बीच से होती है। जब पूरे क्षेत्र में आंदोलन की लहर फैली, तब अंततः 1 नवंबर 2000 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब छत्तीसगढ़ एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।

अहिंसक आंदोलन और भावनात्मक एकता
राज्य निर्माण आंदोलन पूरी तरह अहिंसक और जनभागीदारी पर आधारित था। नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, भाषाई और आर्थिक पहचान को सम्मान दिलाने के लिए अलग राज्य जरूरी है। यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक और भावनात्मक था, जिसने पूरे प्रदेश को एक सूत्र में बांध दिया। रायगढ़ से उठी यह आवाज धीरे-धीरे अंबिकापुर, बिलासपुर, रायपुर और बस्तर तक फैल गई।

क्यों थी अलग राज्य की जरूरत
जगदीश मेहर के अनुसार, अविभाजित मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा, लेकिन विकास की दृष्टि से यह हमेशा उपेक्षित रहा। प्रदेश के संसाधनों का उचित उपयोग नहीं हो पा रहा था, जिससे जनता में असंतोष बढ़ रहा था। इसी वजह से अलग राज्य की मांग मजबूत होती गई और अंततः यह सपना साकार हुआ।

आज जब छत्तीसगढ़ अपने राज्यत्व के 25 वर्ष पूरे कर रहा है, तब रायगढ़ की वह ऐतिहासिक बैठक और उसमें शामिल नेताओं का योगदान राज्य के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन चुका है।

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