संसद की गरिमा को बचाने की ज़रूरत

देश की संसद हमारे लोकतांत्रिक आचरण, संसदीय मर्यादाओं और संवाद की शुचिता का केंद्र होनी चाहिए। जहां संवाद से संकटों के हल खोजे जाएं। लेकिन पिछले दो दिनों में लोकसभा में जो हुआ,वह बहुत निराशाजनक है। सदन के नेता प्रधानमंत्री ही अगर अपने सदन को संबोधित न कर सकें, इससे ज्यादा निराश करने वाली बात क्या हो सकती है। ये हुआ , सबने देखा।
यह संसदीय मर्यादाओं के तार-तार होने का भी समय है। जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को यह अपील करनी पड़ी कि प्रधानमंत्री लोकसभा में न आएं और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब न दें। लोकसभा अध्यक्ष ने किस तरह की आशंकाओं के कारण ऐसा कहा होगा, इसे समझा जा सकता है।
इसके पहले सदन में हुए हंगामे, कागज फाड़कर आसंदी पर फेंकने जैसे दृश्य तो संसद ने अनेक बार देखे हैं। बावजूद इसके एक अभूतपूर्व दृश्य भी लोकसभा ने देखा जब लगभग सात महिला सांसद प्रधानमंत्री के आसन तक जा पहुंचीं। क्या हो सकता था, इसका अनुमान लगाना ठीक नहीं। किंतु बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने जो कुछ कहा वह बताता है, संसदीय मर्यादाओं की सीमाएं लांघते हुए हमारे सांसद दिखे।
परंपरा रही है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब आमतौर पर प्रधानमंत्री देते हैं । इसकी न सिर्फ अपेक्षा रहती है बल्कि प्रतीक्षा भी आखिर सरकार के मुखिया क्या कहते हैं। स्थापित मान्यता यहां टूटती दिखी। प्रधानमंत्री लोकसभा को संबोधित नहीं कर सके। राज्यसभा में भी उनका भाषण विपक्ष की गैरमौजूदगी में हुआ।
संसदीय लोकतंत्र में विरोध और संवाद साथ -साथ चलते हैं। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में पहले दिन से बहस और संवाद की संस्कृति को संरक्षित किया। वे यह चाहते थे अच्छे लोग संसद में आएं और संसदीय बहसों का स्तर ऊंचा हो। अपने विरोधी सांसदों की भी वे प्रशंसा करते हुए नजर आते हैं।












