रेत खदानों की नीलामी से ज्यादा राजस्व की उम्मीद को झटका, आठ खदानों से सालाना करीब सवा चार करोड़ कम मिलेंगे

रायगढ़। रेत खदानों का आवंटन नीलामी के जरिए करने के पीछे सरकार का एक प्रमुख उद्देश्य अधिक राजस्व हासिल करना था, लेकिन अब यही नीति सरकार के लिए परेशानी का कारण बनती नजर आ रही है। जिले की आठ रेत खदानों से शासन को अनुमानित राजस्व से करीब सवा चार करोड़ रुपये कम मिलने की बात सामने आई है। इस मामले को लेकर खनिज विभाग संचालनालय स्तर पर भी चर्चा की जा रही है।
तीन साल की प्रक्रिया के बाद हुई नीलामी
शासन ने करीब तीन साल की प्रक्रिया के बाद जिले की रेत खदानों की नीलामी की थी। ऑक्शन को भी लगभग एक वर्ष बीत चुका है। अब जाकर आठ रेत खदानों के संचालन का रास्ता साफ हुआ है और इनके लिए पर्यावरणीय मंजूरी भी मिल चुकी है। हालांकि, नीलामी के बावजूद सरकार की अधिक राजस्व प्राप्त करने की मंशा पूरी होती नजर नहीं आ रही है।
रेत की किल्लत दूर करने की कोशिश भी अधूरी
रेत खदानों की नीलामी का एक उद्देश्य जिले में रेत की उपलब्धता बढ़ाकर किल्लत को दूर करना भी था। निजी हाथों में खदानों का आवंटन कर नियमित रूप से रेत खनन और आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश की गई। लेकिन राजस्व के लिहाज से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने की स्थिति सामने आई है।
आठ खदानों से 3.89 लाख घनमीटर रेत निकासी
बरभौना, बायसी, लेबड़ा, पुसल्दा, औराभाठा, दर्रामुड़ा, सहजपुरी और सरडामाल स्थित आठ रेत खदानों से कुल 3,89,088 घनमीटर रेत निकासी की अनुमति मांगी गई है। रेत के बेस प्राइस, रॉयल्टी, एनएमईटी, डीएमएफ और उपकर को मिलाकर शासन को प्रति घनमीटर करीब 220 रुपये प्राप्त होने का प्रावधान बताया गया है।
नीलामी के बाद भी राजस्व का गणित बिगड़ा
खदानों के संचालन से शासन को मिलने वाले राजस्व का अनुमान लगाया गया था, लेकिन नीलामी प्रक्रिया और निर्धारित शर्तों के चलते अपेक्षित आय नहीं होने की स्थिति सामने आई है। इससे सरकार के लिए रेत खदानों की नीलामी का राजस्व संबंधी उद्देश्य प्रभावित होता दिख रहा है।
अब खनिज विभाग संचालनालय में इस पूरे मामले पर चर्चा की जा रही है। रेत खदानों के संचालन के साथ जिले में रेत की उपलब्धता, कीमत और शासन को मिलने वाले राजस्व पर आने वाले दिनों में तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।






