सीमित आपातकाल बनाम आज का अघोषित आफ़तकाल कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शुक्ला का बड़ा बयान

रायगढ़, देशभर में 1975 के आपातकाल की वर्षगांठ पर जहां भारतीय जनता पार्टी कड़ी आलोचना कर रही है, वहीं रायगढ़ जिला कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शुक्ला ने इसे तत्कालीन परिस्थितियों में एक “आवश्यक और समयानुकूल निर्णय” बताया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी आपातकाल के सकारात्मक पहलुओं को नजरअंदाज कर, केवल अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने पेश कर रही है।
आपातकाल के सकारात्मक पहलू
अनिल शुक्ला ने जोर देते हुए कहा कि 1975 का आपातकाल कई महत्वपूर्ण सुधारों का प्रतीक रहा है:
🔸 आर्थिक सुधार
- आर्थिक अनुशासन: सरकारी कार्यप्रणाली में वित्तीय अनुशासन लाया गया, जिससे बजट प्रबंधन और विकास परियोजनाओं को गति मिली।
- उत्पादकता में वृद्धि: उद्योगों और श्रमिक संगठनों में अनुशासन बढ़ा, जिससे औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय इज़ाफा हुआ।
🔸 सामाजिक सुधार
- शहरीकरण और स्वच्छता: शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता और बुनियादी ढांचे पर विशेष बल दिया गया।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: प्राथमिक शिक्षा और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ, जिससे जनजीवन बेहतर हुआ।
🔸 प्रशासनिक सुधार
- सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता: नौकरशाही में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा मिला।
- भ्रष्टाचार पर अंकुश: कई विभागों में भ्रष्टाचार पर तत्काल और सख्त कार्रवाई की गई।
🔸 राष्ट्रीय एकता और आधुनिकीकरण
- देश की एकता और अखंडता को मजबूती मिली। साथ ही औद्योगीकरण और तकनीकी विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए गए।
बीजेपी का “चयनात्मक दृष्टिकोण” और आज का आफ़तकाल
अनिल शुक्ला ने भाजपा के वर्तमान शासन को “नियमित आफ़तकाल” करार देते हुए कहा कि आज देश ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी संस्थाओं के राजनीतिक दुरुपयोग से त्रस्त है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और समाजसेवियों को सरकारी तंत्र के माध्यम से डराया-धमकाया जा रहा है।
उन्होंने कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश चौधरी के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा, “आप पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं और दृष्टिकोण के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। यदि आप आपातकाल के लाभकारी पहलुओं को भी ध्यान में रखते, तो आज यह विषय बहस का नहीं, समझ का होता।”
भाजपा के कार्यकाल में लोकतंत्र पर खतरा
शुक्ला ने कहा कि नोटबंदी, नागरिकता संशोधन कानून, राफेल सौदा और पेगासस जासूसी जैसे मामलों पर केंद्र सरकार का रवैया पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और जवाबदेही से मुक्त रहा है।
“यदि बीजेपी ईमानदार है, तो वह बताए कि किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन में 700 से अधिक लोगों की जान क्यों गई और क्यों आज तक उनके परिजनों को मुआवजा या शोक संवेदना नहीं दी गई,” उन्होंने कहा।
मीसाबंदियों की पेंशन बंद कर, किसान आंदोलन के शहीदों के परिवारों को मदद मिले
अनिल शुक्ला ने मांग की कि अब वक्त आ गया है कि मीसा कानून के तहत बंदियों को दी जा रही पेंशन बंद कर, किसानों के परिजनों को पेंशन दी जाए जिन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी जान दी।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि भाजपा आपातकाल को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहती है, तो उसे तीन कृषि कानूनों के विरोध, नोटबंदी, और 52 साल तक जनसंघ कार्यालय पर झंडा न फहराने जैसे तथ्य भी किताबों में शामिल करने चाहिए।
अंत में कहा:
“हमें भाजपा की असलियत उजागर करने के लिए कोई प्रदर्शनी नहीं लगानी होगी। जनता उनके ‘वाशिंग मशीन मॉडल’ से ही सब समझ चुकी है कि किस तरह अपराधी भी सफेदपोश बनकर निकल आते हैं।”












