छत्तीसगढ़

हर बार हमले में क्यों सफल होते है नक्सली.? इस सवाल का जवाब राजनीतिज्ञों के पास हो न हो पर वहां लड़ने वाला जवान बेहतर तरीके से जानता हैं – नितिन सिन्हा(स्वतंत्र लेखन व व्यक्तिगत विचार)

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आइये ऐसे तीन पूर्व जवानों से हुई चर्चा का अंश पेश करता हूँ.. जिसे पढ़ सुनकर आपकी मृतप्राय चेतना जागे न जागे पर सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत आपमें जरूर आ जाएगी..

सुजॉय कहते हैं,- सरकार और उसके तंत्र के पास नक्सलियों से लड़ने का साधन और क्षमता तो जरूर है परन्तु उसकी इच्छाशक्ति बहुत कमजोर है।।

शेषनाथ पांडे के कहे अनुसारनक्सली और आंतकियाँ से लड़ाई की कमान अर्धसेना और पुलिस बल के आराम फरामोश व भ्रष्टाचारी अधिकारियों के हाथ मे है जो निरकुंश और आताताई भी है। आज तक के तमाम हमलों में उनसे किसी ने कभी कोई सवाल नही किया। बल्कि हमलों के बाद और पहले राजनीतिक दल एक दूसरे पर उंगली उठाते रहे। इस बीच मौका पड़ा तो एक साथ एक मंच पर खड़े होकर नक्सली हमलों की सिर्फ मौखिक निंदा की।। अधिकारियों को यह मालूम है कि जब तक राजनीति में ऐसे नेता जिंदा रहेँगे उनका कुछ नही बिगड़ेगा। उनकी जवाबदेही पर कोई प्रश्न भी नही करेगा यही असफलता का बड़ा कारण है,जबकि नक्सली हर नुकसान के बाद सिरे से बदलाव करते रहे हैं,वे अपनी रणनीतियों में लो कैडर की राय को भी गम्भीरता से लेते है।।

जिले में रहने वाले ताड़मेटला कांड के प्रत्यक्षदर्शी crpf जवान ने नाम न बताने की शर्तों में कहा,कि.. देश के नेताओं और बल के अधिकारियों को भली भांति मालूम है,कि देश में जब तक बेरोजगार और जरूरतमंद जिंदा है,उन्हें बलि के बकरों (नक्सली और आतंकी हमले में मरने वाले जवानो) की कमी नही होगी।। 6 अप्रैल 2010 के ताड़मेटला हमले के पूर्व 72 घण्टे जितना लंबा एरिया सेन्टाइज का आदेश किस रणनीति के तहत दिया गया था.?? इस सवाल का कोई जवाब नही मिलेगा.?? माओवादियों ने थककर चूर हो चुके हमारे सांथियों को न सिर्फ चुन-चुनकर मारा था बल्कि हाथ की घड़ियां,अंगूठियाँ और जूते,ड्रेस निकालने के लिए शहीद जवानों के शव को क्षत-विक्षत भी किया था।। जिनकी सांसे चल रही थी उन्हें धारदार हथियार से काट रहे थे। पूरे चार से पांच घण्टे चले खूनी नंगे खेल के बीच नक्सलियों से लड़ने कुछ सौ मीटर दूर स्थित पुलिस कैम्प से हमारी तरफ कोई बैकप पार्टी तक नही भेजी गई थी।। इस घटना ने मुझे इतना विचलित कर दिया था,कि जिस देश और फोर्स के लिए हम अपनी जान लड़ाने को तैयार रहते है। उनसे बदले में हमें क्या मिलता है.?? मौके पर मदद नही मिलती,जिंदा रहने तक सम्मान नही मिलता और रिटार्यमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन तक छीन ली जाती है। आप पत्रकार है आप खुद बताइये इन 11 सालों आपने क्या बदलाव देखा है?? हर शहादत के बाद श्रद्धाजंलि और कटु निंदा का दो दिवसीय दौर चलता है। फिर सब कुछ पुराने ढर्रे में चलने लगता है। हफ्ते-दस दिन या महीने दो-महीने में फिर बड़ी घटना घट जाती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ,कि बस्तर में जवान सिर्फ शहीदों की संख्या बढ़ाने या गांव वालों पर अनावश्यक अत्याचार करने के लिए ही ले जाये जाते हैं।

वास्तव में बीजापुर जैसी एक दर्जन से अधिक घटनाओं में पूरे देश ने देखा है,कि नेता और अधिकारी फार्मेल्टी निभाने के लिए शहीदों के शव को श्रद्धाजंलि दे आते है,और सरकारें हमेशा दावा करती है कि जवानो की शहादत व्यर्थ नही जाएगी। कुछ जवान शहीद जरूर हुए है पर बाकियों का मनोबल ऊंचा है।। आगे भी इस क्षेत्र में अभियान जारी रहेगा।अरे साहब जवान भी इंसान होता है कोई रोबोट नही। कभी उससे पूछा है,अपने साथियों को इस तरह बेबसी से मरता देखकर उस पर क्या गुजरती है??

कमोबेश यही चार लाइन तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी चितम्बरम और तबके मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के द्वारा लिख कर छोड़ा गया है जिसे आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री भुपेश बघेल बीजापुर और रायपुर में दोहरा रहे हैं।।

मैने भी वर्ष 2008 से जारी पत्रकारिता काल के दौरान हर नक्सली हमले के बाद उन्हें इतना ही बोलते और कहते सुना है।। जबकि ऐसे तमाम नक्सल हमलों की पृष्ठभूमि मैं खुद व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करता रहा हूँ।। 2008 से 2019 तक अपने खर्चों पर राज्य के बीजापुर,नरायणपुर,मैलावाड़ा,सुकमा,ताड़मेटला,रानिबोदली,कोंटा,झीरम,बुर्कापाल,राजनांदगांव,ओरछा, कोंडागांव,पखांजुर,दल्ली- राजहरा,धमतरी,महासमुंद,गरियाबंदके अलावा देश के दूसरे राज्यों में जैसे उड़ीसा के दामनजोडी,मलकानगिरी, कालाहांडी,कोरापुट,बरगढ़,बलांगीर रायगढा,नियमागिरी से लेकर महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और झारखंड राज्य के चाईबासा,मनोहरपुर,खूंटी,गुमला, पश्चिम सिंहभूम,रांची,दुमका, गिरिडीह,पलामू,गढ़वा,चतरा, लोहरदगा और बोकारो इन जगहों की अध्यन यात्रा कर नक्सल हिंसा और उससे निपटने की सरकारी नीतियों को समझने का प्रयास किया और जाना है कि अधिकांश जगहों में जवानों की तैनाती करीब-करीब एक जैसी है।। आपरेशन के तरीके भी करीब-करीब एक से हैं।। यहां सिर्फ उड़ीसा,झारखंड और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों की नक्सल रणनीति मुझे कुछ सही लगी। इन राज्यों ने आंध्रप्रदेश की तरह अपने फोर्स के जवानों को हमेशा आक्रामक रखा है। यहां तैनात राज्य पुलिस बल और केंद्रीय बल के बीच तालमेल भी छ ग राज्य की अपेक्षा बेहतर है।। जबकि छ ग में हालात बिलकुल उनसे उलट है।। यहां तत्कालीन सरकार के 15 साल और आज की सरकार के 2 साल के शासन काल मे कमोबेश एक जैसी ही स्थिति बनी हुई है।। इन सबके बीच जवानों ने कुछ जिम्मेदार अधिकारियों के नेतृत्व में अकेले अपने ही पराक्रम और समर्पण भाव के दम पर नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्रों का दायरा काफी छोटे क्षेत्र तक सिमटा दिया है। कभी राज्य के 22 जिलों में फैला लाल आतंक आज महज 6/7 जिलों में ही सक्रिय रह गया है।।

इधर छ ग के नक्सल हमलों को बारीकी से देखे तो आप पाएंगे कि नक्सलियों से लड़ाई के दौरान सुरक्षा बल के जवानों की कहीं कोई चूक नही की है। उन्होंने हर परिस्थितियों में माओवादियों का डटकर मुकाबला किया है। बल्कि हर बार उन्हें डिप्लॉय करने या टास्क देकर बेमतब सर्चिंग में भेजने वाले अधिकारियों ने ही बड़ी और गम्भीर गलतियां की हैं।। जबकि राजनीति दल से जुड़े कुछ लोगों ने नक्सलवाद को महज अपने निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए अब तक क्षेत्र में पाल-पोश कर रखा हुआ है। आज तक की दर्जनों घटनाओं के बाद भी यहां इनसे लड़ने की सरकारी इच्छाशक्ति यही बताती रही है जो आज भी पूरी तरह से लचर और गैर-जिम्मेदार बनी हुई है।।

अलबत्ता नक्सलवाद को लेकर जब-जब राज्य सरकार अपना सीना ठोंकते नजर आई है तब-तब कुछ घण्टों या दिनों के बाद ही माओवादी ने राज्य में बड़े हमले कर सरकार को जवाब दिया है।।

बहरहाल शाम हो चुकी है,बीजापुर नक्सल हमले का दौर और शोक दोनों खत्म होने को है।। शहीद जवानों का शव उनके गृह ग्राम भेजा जा चुका है।। केंद्रीय गृह मंत्री और राज्य के मुखिया ने हमले की कड़े शब्दों में निंदा कर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए आपरेशन जारी रखने की बात कही है। मुख्यमंत्री जी ने चतुर बनिये की तरह इंटलीजेंस फेलुवर या असफल रणनीति से जुड़े सवालों को सिरे से नकार दिया है। यही वजह है कि दो दिन की तमाम मैराथन बैठकों के बाद भी जैसी अपेक्षा थी वैसा कोई निर्णय लिया जाना नहीं दिख रहा है।। इस बीच बीजापुर हमले में एक कोबरा जवान के नक्सल अपहरण की जानकारी भी सामने आई है।। उसे लेकर सरकारी तंत्र में कोई चिंता नही देखी गई है। जबकि नक्सलियों ने अपनी तरफ से अपहृत जवान को सुरक्षित छोड़ने का वायदा जरूर किया है।। ईश्वर से प्रार्थना है कि उन 24 घरों के शोकाकुल सदस्यों को आंतरिक शक्ति प्रदान करें,जिनके सामने उनके बेटे,पति,भाई,पिता और अभिन्न मित्र के क्षत-विक्षत शव आने वाले है या आ चुके है।।

ईधर ग्राउंड जीरो पर पहुंचे मीडिया कर्मियों ने सरकार के सामने आपरेशन की गलत कमांड से लेकर इंटलीजेंस फेलुवर का पूरा खाका खींच दिया है।।
ये बात अलग है कि उसे स्वीकारने का साहस न तो सरकार और उसके सिस्टम के पास है न ही सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत किसी आम नागरिक के पास है।।

वैसे एक जिम्मेदार नागरिक को मीडिया के इन बड़े सवालों पर गौर फरमाना चाहिए..

ऑपरेशनल प्लानिंग पर सवाल
केंद्र के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार व CRPF के पूर्व डीजीपी के.विजय कुमार के अलावा मौजूदा आईजी ऑपरेशंस नलिन प्रभात पिछले 20 दिनों से जगदलपुर,रायपुर व बीजापुर के क्षेत्रों में खुद मौजूद थे। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में जवानों का शहीद होना पूरी ऑपरेशनल प्लानिंग पर सवाल खड़े कर रहा है।

1 नक्सली लीडर सचेत रहे सुरक्षा अधिकारी नही

नक्सल ऑपरेशंस से जुड़े सूत्रों की माने तो इस तरह एक ही इलाके में बड़े अधिकारियों की मौजूदगी नक्सलियों को भी अलर्ट कर देती है। उन्हें बड़े अधिकारियों के लगातार मूवमेंट की भनक लग जाती है, जिसके अनुसार वो अपनी प्लानिंग करते हैं। बीजापुर नक्सली हमले में भी यही हुआ। बीजापुर एस पी ने हमले में 22 जवानों के शहीद होने की बात कही है। उधर,घटनास्थल पर मौजूद लोगों के मुताबिक शहीद जवानों की संख्या 30 तक भी हो सकती है।

2-वक्त के साथ रणनीति नही बदली गई

छत्तीसगढ़ के जंगलों में छापामार लड़ाई वाले इलाकों में सुरक्षाबल लंबे समय से एक ही रणनीति के तहत काम करते देखे गए है । यहां पर किसी एक रणनीति पर सालों-साल तक चलते रहना जवानों के लिए ही घातक सिद्ध हो जाता है।। जबकि बड़े अधिकारियों का काम यही होता है कि वो आपरेशन के अनुरुप रणनीतिक बदलाव करते हुए,न केवल नक्सल मूवमेंट को कमजोर करें बल्कि समय-समय पर उन पर घातक हमले भी करवाएँ। ऊपर से बनी इन रणनीतियों पर ग्राउंड में मौजूद अधिकारी अपने इलाके की टोपोग्राफी और डिमांड के हिसाब से ही ऑपरेशन प्लान करते आए हैं,लेकिन अगर लंबे समय तक रणनीति में बदलाव न हो तो सुरक्षाबलों की परेशानियां बढ़ती जाती है। ऐसे में नक्सलियों को अक्सर अपने ऊपर होने वाले हमलों की पूर्व जानकारी हासिल करना आसान हो जाता है,यही से जवानों की जान भी जोखिम में पड़ जाती है।

3- Ac रूम में प्लांनिग और हद से ज्यादा टेक्नोलॉजी पर निर्भरता….ह्यूमन इंटेलिजेंस की कमी हर बार खल जाती है.

खबर है कि बीजापुर के नक्सली हमले से पहले अन आर्म्ड व्हिकल (UAV)या ड्रोन से मिली फोटो और वीडियो के आधार पर कार्यालय में बैठकर यहां का ऑपरेशन प्लान किया गया था। लेकिन नक्सल ऑपरेशन के सूत्र बताते हैं कि यहां 100-200 नक्सलियों का मूवमेंट दिखना एकदम आम बात है। इसे आप किसी ऑपरेशन को प्लान करने का इंटेलिजेंस इनपुट नहीं मान सकते हैं। सफल लड़ाई के पहले आपका मानव सूचना तंत्र एकदम प्रभावी होना चाहिए। जिसकी कमी की वजह से ही करीब 700 जवानों को 2 हजार नक्सलियों ने बीजापुर के तर्रेम इलाके में तीन बार एम्बुश में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास घेर लिया था। तीन से चार घंटे चली मुठभेड़ के पहले क्रम में ही 8 जवान शहीद हो चुके थे और बाकी जवान अगले दो चरण की गोलीबारी सहित लांचर हमले में मारे गए।। घायल जवानो का कहना है कि उक्त नक्सल हमला इतना जबरदस्त था कि उनका सम्भल पाना मुश्किल था। बल की प्रतिक्रिया के कारण उनकी केजुवल्टी अधिक नही हुई। इस हमले में हमारे 24 जवान शहीद हुए और 31घायल हुए हैं। वही 15 से 20 माओवादियों को भी हमने मार गिराया है।।

लोकल लेवल पर नक्सली गुटों के साथ शामिल लोग सुरक्षा बलों के खिलाफ किसी घातक हथियार से कम नही होते हैं। इन्हीं की सहायता से नक्सली मिली पिनपॉइंट पर ऑपरेशंस का प्लान करते हैं। जबकि पिछले कुछ सालों से नक्सल ऑपरेशन में शामिल दागी अधिकारी सिर्फ वाहवाही लूटने के लिए सरेंडर पालिसी पर जोर देने में लगे रहे है।उन्होंने क्षेत्र में अपने सूचना तंत्र की मजबूती पर कभी जोर नही दिया है।। जबकि सरेंडर करने वाले नक्सली या मुखबिर से मिली जानकारी कुछ दिनों बाद ही अधिक काम की नहीं होती।

4-सुरक्षा बलों के बीच कमांड और तालमेल का अभाव

आम तौर पर नक्सल आपरेशन में भेजे गए अलग बल के जवानों की कमांड और ट्रेनिंग भी अलग-अलग तरीके की होती है। उनके बीच कमांड और तालमेल का अभाव अक्सर सामने आता रहा है।। बीजापुर में हिड़मा के गांव पर भेजे गए पांच तरह की अलग-अलग फोर्सेज में भी यही देखा गया। ऐसे ऑपरेशन में अलग-अलग बलों की मौजूदगी कमांड व कंट्रोल के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। वह भी तब जब मौके पर एकीकृत नेतृत्व का अभाव होता है। हमले की सूरत में अक्सर जवान अपने-अपने प्रशिक्षण व बनावट के हिसाब से कार्रवाई करते हैं। ऐसे में उनके बीच यूनिफॉर्मिटी(एकरूपता) नहीं रह पाती है। लेकिन इसके उलट दूसरी ओर संख्या में हमेशा उनसे अधिक रहने वाले नक्सलियों की ट्रेनिंग और कमांड हर बार एक जैसी ही रहती है। हजार से दो हजार की संख्या में भी हमला करने वाले नक्सली अपना काम पूरी तरह से संगठित और जिम्मेदार होकर कर जाते हैं। उनकी यूनिट कितनी भी हो, लेकिन एक्शन के समय उनकी यूनिफॉर्मिटी कभी खराब नहीं होती है। यही वजह है कि कई मोर्चों में बड़ी मात खाने के बाद भी नक्सली अपने मृत सांथियों का शव अपने सांथ ले जाने में सफल होते है।। हमले में लड़ रहे नक्सलियों के बराबर उनकी मेडीकल और रेस्क्यू यूनिट काम कर रही होती है। जबकि बल को अपनो से सहायता के लिए भी घण्टों इंतजार करना पड़ता है।।

रही बात शहीदों की तो देश का सिस्टम चलाने वाले लोगो से लेकर आम जनता की सोंच भी यही होती है कि- सेना या पुलिस में लोग शहीद होने के लिए ही भर्ती होने आते हैं।।

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