छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: टैक्स और वैधानिक देनदारियों से जुड़े विवादों का निपटारा आर्बिट्रेशन से नहीं होगा

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि टैक्स, सेस और अन्य वैधानिक देनदारियों से जुड़े विवादों का समाधान आर्बिट्रेशन यानी मध्यस्थता के जरिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित कानूनों के तहत तय मंचों पर ही राहत मांगी जा सकती है। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने कोलकाता की ठेका कंपनी एसके सामंता एंड कंपनी की याचिका खारिज कर दी।
एसईसीएल प्रोजेक्ट से जुड़ा था मामला
पूरा विवाद एसईसीएल के गेवरा ओपनकास्ट प्रोजेक्ट में वर्कशॉप और स्टोर निर्माण कार्य से जुड़ा हुआ था। निर्माण कार्य के भुगतान के दौरान एसईसीएल ने श्रमिक कल्याण उपकर (लेबर वेलफेयर सेस) के रूप में एक प्रतिशत राशि काट ली थी। ठेका कंपनी ने इस कटौती को गलत बताते हुए दावा किया कि उसका कार्य खनन गतिविधि से संबंधित था, इसलिए उस पर निर्माण श्रमिक कानून लागू नहीं होना चाहिए। कंपनी ने कटौती की गई राशि वापस दिलाने के लिए कोर्ट से आर्बिट्रेटर नियुक्त करने की मांग भी की थी।
एसईसीएल ने कोर्ट में क्या कहा
सुनवाई के दौरान एसईसीएल की ओर से कहा गया कि उसने केवल संग्रहण एजेंट के रूप में कार्य किया है और काटी गई राशि राज्य सरकार के खाते में जमा कर दी गई है। ऐसे में रकम लौटाने की जिम्मेदारी उसकी नहीं बनती। वहीं राज्य सरकार ने दलील दी कि कंपनी का कार्य निर्माण गतिविधि से जुड़ा था, न कि कोयला उत्पादन से। इसलिए एक प्रतिशत सेस की कटौती पूरी तरह कानून के अनुरूप की गई।
अनुबंध स्वीकार करने के बाद नहीं उठा सकते विवाद
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कंपनी को टेंडर प्रक्रिया के दौरान ही यह जानकारी थी कि भुगतान से एक प्रतिशत सेस काटा जाएगा। इसके बावजूद कंपनी ने अनुबंध की सभी शर्तें स्वीकार कर कार्य लिया था। ऐसे में बाद में उसी शर्त को विवाद बनाना उचित नहीं माना जा सकता।
हर विवाद नहीं जाएगा मध्यस्थता में
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि किसी अनुबंध में आर्बिट्रेशन क्लॉज मौजूद होने का मतलब यह नहीं है कि हर विवाद मध्यस्थता के जरिए ही सुलझाया जाएगा। अगर मामला किसी विशेष कानून के तहत टैक्स, उपकर या अन्य वैधानिक देनदारी से जुड़ा है, तो उसका निपटारा संबंधित वैधानिक प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकरण के समक्ष ही होगा।
याचिका खारिज
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ठेका कंपनी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह मामला वैधानिक देनदारी से जुड़ा है, इसलिए इसे आर्बिट्रेशन के दायरे में नहीं लाया जा सकता।






