छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में यूट्यूबरों की एंट्री पर रोक, उठे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल

सरकारी स्कूल : छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में अब यूट्यूबरों और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स की एंट्री पर रोक लगाने का फैसला चर्चा का विषय बन गया है। सरकार की ओर से इसके पीछे स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था, अनुशासन और बच्चों की सुरक्षा का हवाला दिया जा रहा है। हालांकि, इस फैसले के बाद यह सवाल भी उठने लगा है कि सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत जनता तक पहुंचाने का स्वतंत्र माध्यम क्या होगा?
CJP की मुहिम के बाद सामने आईं स्कूलों की तस्वीरें
हाल ही में CJP की एक मुहिम के बाद देशभर के सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं को लेकर सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए। इनमें छत्तीसगढ़ के भी कुछ स्कूलों की तस्वीरें शामिल हैं, जहां जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं दिखाई गईं। ऐसे वीडियो यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर तेजी से वायरल हुए।
राजस्थान, यूपी और हरियाणा के बाद छत्तीसगढ़ में भी रोक
राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी सरकारी स्कूलों में यूट्यूबरों की एंट्री को लेकर प्रतिबंध की चर्चा तेज है। सरकार का तर्क है कि अनधिकृत रूप से वीडियो बनाने से स्कूलों में अनावश्यक व्यवधान पैदा हो सकता है और शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने के साथ नकारात्मक माहौल बन सकता है।
बच्चों की निजता और सुरक्षा भी इस तरह के निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्कूल परिसर में बच्चों के वीडियो बनाने और उन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित करने को लेकर निश्चित रूप से नियम और निगरानी जरूरी है।
लेकिन स्कूलों की कमियां सामने कौन लाएगा?
फैसले के साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा होता है। सरकारी स्कूल जनता के टैक्स और सरकारी बजट से संचालित होते हैं। ऐसे में यदि किसी स्कूल में मिड-डे मील की गुणवत्ता खराब है, शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं, भवन जर्जर है, बच्चों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं या पढ़ाई का स्तर कमजोर है, तो इन कमियों की स्वतंत्र जांच और तस्वीर जनता के सामने कैसे आएगी?
सिर्फ अधिकारियों की रिपोर्ट या विभागीय निरीक्षण के भरोसे व्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने आना मुश्किल हो सकता है। कई बार जमीनी स्तर पर मौजूद लोगों या स्थानीय पत्रकारों की सूचना से ही प्रशासन को किसी समस्या की जानकारी मिलती है।
सोशल मीडिया ने कई मामलों को बनाया सार्वजनिक
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों से समय-समय पर शिक्षकों के शराब के नशे में स्कूल पहुंचने और अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों के आरोपों से जुड़े मामले भी सामने आते रहे हैं। इनमें से कुछ मामले सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद चर्चा में आए।
इसलिए सोशल मीडिया को पूरी तरह नकारात्मक नजर से देखना भी उचित नहीं होगा। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाला हर वीडियो सही हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन हर वीडियो को केवल नकारात्मकता फैलाने वाला मान लेना भी सही नहीं कहा जा सकता।
व्यूज के लिए वीडियो बनाने वालों पर कार्रवाई जरूरी
यह भी सच है कि कुछ कंटेंट क्रिएटर्स केवल व्यूज और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए स्कूलों में पहुंचकर वीडियो बनाते हैं। इससे कक्षा में पढ़ाई बाधित हो सकती है और बच्चों की निजता प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में नियम बनाकर कार्रवाई की जानी चाहिए।
लेकिन नियम इस तरह के होने चाहिए कि वास्तविक पत्रकारिता, जनहित में रिपोर्टिंग और गंभीर अनियमितताओं को सामने लाने का रास्ता पूरी तरह बंद न हो।
वेब पोर्टल और डिजिटल पत्रकारिता के सामने नई चुनौती
छत्तीसगढ़ में स्कूलों में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से वेब पोर्टल और समाचार पत्रों तक पहुंचाई जाती है। डिजिटल दौर में बड़ी संख्या में खबरें वेब पोर्टलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से ही पाठकों तक पहुंचती हैं।
कई स्थानीय वेब पोर्टलों के पत्रकारों के अपने यूट्यूब चैनल भी हैं, जहां वे खबरों से संबंधित वीडियो प्रकाशित करते हैं। ऐसे में यदि सरकारी स्कूलों में कैमरा लेकर प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगाई जाती है, तो पत्रकारिता और सामान्य कंटेंट क्रिएशन के बीच स्पष्ट अंतर तय करना जरूरी होगा।
डिजिटल दौर में सरकार और मीडिया के बीच संतुलन जरूरी
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, निजता और पढ़ाई का माहौल बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। वहीं सरकारी संस्थानों की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
जरूरत इस बात की है कि सरकार ऐसा स्पष्ट और संतुलित नियम बनाए, जिसमें अनधिकृत कंटेंट क्रिएशन और बच्चों की निजता से समझौते पर रोक हो, लेकिन मान्यता प्राप्त पत्रकारों और जनहित से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत रास्ता खुला रहे।
आखिर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्कूलों में कौन प्रवेश कर सकता है, बल्कि यह भी है कि सरकारी स्कूलों में क्या हो रहा है, इसकी निष्पक्ष जानकारी जनता तक कैसे पहुंचेगी? डिजिटल दौर में इस सवाल का जवाब सरकार, प्रशासन और मीडिया—तीनों को मिलकर तलाशना होगा।






