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वैश्विक संकट के बीच भारत की रणनीति: मजबूत नेतृत्व की परीक्षा में खरा उतरता तंत्र

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युद्ध की आंच और भारत की चुनौती

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को झकझोर दिया है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच टकराव, साथ ही होरमुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण की स्थिति ने वैश्विक बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। ऐसे समय में भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के सामने बड़ा संकट खड़ा होना स्वाभाविक था।

तत्काल रणनीति और सरकार की सक्रियता

इस चुनौतीपूर्ण माहौल में केंद्र सरकार ने तेजी से कदम उठाए। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार हालात को लेकर सतर्क ही नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से नियंत्रण में है। ऊर्जा, उर्वरक, कृषि, परिवहन और आपूर्ति तंत्र जैसे हर अहम सेक्टर पर निगरानी बढ़ाई गई।

ऊर्जा संकट से निपटने की रणनीति

सबसे बड़ा खतरा ऊर्जा आपूर्ति पर था। होरमुज मार्ग में बाधा के चलते तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका थी। ऐसे में भारत ने तेजी से वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू की। एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति बनाए रखने के साथ घरेलू कीमतों को स्थिर रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी, जिसे काफी हद तक संभाला गया।

जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्ती

संकट के समय बाजार में कालाबाजारी और जमाखोरी की आशंका बढ़ जाती है। सरकार ने इस खतरे को समझते हुए राज्यों को सख्त निर्देश दिए। उर्वरक, खाद्य सामग्री और ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी और छापेमारी तेज की गई, जिससे बाजार में संतुलन बनाए रखने में मदद मिली।

कृषि और खाद्य सुरक्षा पर फोकस

कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया है। खरीफ और रबी दोनों सीजन के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास तेज किए गए। अगर यह मोर्चा कमजोर पड़ता, तो देश की खाद्य सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता था।

सूचना प्रबंधन और अफवाहों पर नियंत्रण

युद्ध जैसे हालात में अफवाहें भी संकट को बढ़ा सकती हैं। सरकार ने इस पहलू पर भी खास ध्यान दिया। सही और समय पर जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए नियंत्रण कक्ष बनाए गए और गलत सूचना फैलाने वालों पर नजर रखी जा रही है।

वैश्विक कूटनीति में सक्रिय भूमिका

भारत ने सिर्फ आंतरिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय कूटनीति अपनाई। सऊदी अरब, यूएई, कतर, फ्रांस और अन्य देशों के साथ लगातार संवाद कर भारत ने अपने हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया।

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