कांकेर IED ब्लास्ट: नक्सलमुक्त घोषणा के बाद बड़ा झटका, जवानों की शहादत ने बढ़ाई चिंता

रायपुर/कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में शनिवार दोपहर हुए IED विस्फोट ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जारी ऑपरेशन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, DRG (जिला रिजर्व गार्ड) के जवान बारूदी सुरंग निष्क्रिय करने अभियान पर निकले थे, तभी जोरदार धमाका हुआ। इस घटना में जवानों के शहीद होने की खबर सामने आई है, जबकि कुछ अन्य घायल बताए जा रहे हैं।
नक्सलमुक्त दावे के बाद पहली बड़ी घटना
राज्य सरकार ने 31 मार्च को कई क्षेत्रों को नक्सल प्रभाव से मुक्त घोषित किया था। ऐसे में यह विस्फोट प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यह घटना संकेत देती है कि भले ही सक्रिय माओवादी मौजूदगी कमजोर हुई हो, लेकिन पहले से बिछाए गए IED और छिपे विस्फोटक अब भी बड़ा खतरा बने हुए हैं।
क्यों गंभीर है यह हमला?
यह हमला सीधे मुठभेड़ नहीं, बल्कि डिमाइनिंग ऑपरेशन के दौरान हुआ। यानी सुरक्षा बल खतरे को खत्म करने निकले थे और उसी दौरान निशाना बन गए। इससे स्पष्ट है कि जंगल क्षेत्रों में पुराने विस्फोटकों की सफाई अभी लंबी चुनौती है।
सुरक्षा रणनीति पर असर
इस घटना के बाद संभव है कि:
- सर्च ऑपरेशन और तेज किए जाएं
- रोड ओपनिंग पार्टी (ROP) की संख्या बढ़ाई जाए
- मेटल डिटेक्शन और बम डिस्पोजल यूनिट की तैनाती बढ़े
- ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा अलर्ट फिर सख्त किया जाए
सरकार पर दबाव बढ़ेगा
घटना के बाद सरकार पर यह दबाव रहेगा कि वह नक्सलमुक्त दावों के साथ जमीनी सुरक्षा हालात भी स्पष्ट करे। यदि क्षेत्र सुरक्षित घोषित किए गए हैं, तो वहां IED कैसे सक्रिय रहे — यह बड़ा सवाल बनेगा।
स्थानीय लोगों में भी डर
ऐसे इलाकों में केवल जवान ही नहीं, ग्रामीण भी जोखिम में रहते हैं। खेत, जंगल मार्ग, कच्ची सड़कें और पगडंडियां कई बार IED से प्रभावित रही हैं। इसलिए यह घटना आम लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ी है।
कांकेर विस्फोट सिर्फ एक सुरक्षा घटना नहीं, बल्कि यह याद दिलाता है कि नक्सलवाद केवल बंदूक से नहीं, छिपे बारूद से भी लड़ाई है। क्षेत्र में शांति बहाली के दावों के बीच ज़मीन पर अभी भी खतरा बाकी है। जवानों की शहादत बताती है कि संघर्ष खत्म नहीं, सिर्फ उसका स्वरूप बदला है।






