कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, चार साल का रिकॉर्ड टूटा

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। तेल की कीमतों ने हाल ही में पिछले चार वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है, जिससे दुनिया के साथ-साथ भारत के घरेलू बाजार में भी चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव जारी रहा तो आने वाले समय में तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ी वजह
तेल की कीमतों में तेजी की मुख्य वजह मिडिल ईस्ट में बढ़ता संघर्ष और Strait of Hormuz के आसपास पैदा हुई अनिश्चितता है। यह समुद्री मार्ग दुनिया में तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि इस मार्ग से सप्लाई बाधित होती है तो वैश्विक बाजार में तेल की कमी की आशंका बढ़ जाती है, जिससे कीमतों में तेजी आ जाती है।
ब्रेंट और WTI क्रूड में बढ़ोतरी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है। वहीं West Texas Intermediate (WTI) क्रूड फ्यूचर्स में लगभग 6 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है और इसका भाव करीब 96 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
पिछले सप्ताह की शुरुआत में कच्चे तेल का दाम 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, हालांकि बाद में इसमें कुछ नरमी आई। लेकिन बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ तो कीमतें फिर से तेजी पकड़ सकती हैं।
150 डॉलर तक पहुंच सकता है कच्चा तेल
बाजार के जानकारों के मुताबिक अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है और तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
खासकर भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, उन्हें महंगे तेल के कारण व्यापार घाटा और महंगाई दोनों का दबाव झेलना पड़ सकता है।
शेयर बाजार और रुपया भी दबाव में
मिडिल ईस्ट के तनाव का असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। मार्च में NIFTY 50 करीब 8 प्रतिशत तक गिर चुका है। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार पर दबाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आमतौर पर शेयर बाजार के लिए सकारात्मक नहीं होती। वहीं सोने-चांदी की कीमतों पर इसका सीधा असर कम देखने को मिल सकता है, क्योंकि तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ जाती है और कई निवेशक सोने की बजाय डॉलर की ओर रुख करने लगते हैं।
नोट: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन होता है। शेयरों, म्यूचुअल फंड्स और अन्य वित्तीय साधनों की कीमतें बाजार की परिस्थितियों के आधार पर घट-बढ़ सकती हैं और इसमें पूंजी हानि की संभावना भी रहती है। यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है, इसे निवेश या वित्तीय सलाह के रूप में न लें।






