छत्तीसगढ़

आंगनबाड़ी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के आरोप: बिलासपुर में फूटा असंतोष, जांच पर टिकी निगाहें

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बिलासपुर, 14 अप्रैल Bilaspur जिले के कोटा ब्लॉक अंतर्गत बेलगहना सेक्टर में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का विरोध केवल एक अधिकारी के खिलाफ शिकायत भर नहीं है, बल्कि यह जमीनी स्तर पर संचालित महिला एवं बाल विकास योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। कार्यकर्ताओं ने सेक्टर सुपरवाइजर कीर्ति किरण मोंगरे पर आर्थिक शोषण, दुर्व्यवहार और योजनाओं में अनियमितता जैसे आरोप लगाए हैं।


सिर्फ शिकायत नहीं, सिस्टम पर सवाल

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनसे नियमित रूप से पैसे वसूले जाते हैं—यह केवल व्यक्तिगत स्तर का मामला नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की ओर इशारा करता है जहां निगरानी तंत्र कमजोर होता जा रहा है। प्रति केंद्र ₹20 मासिक शुल्क, टीए बिल में कटौती और सुपोषण चौपाल जैसी योजनाओं में कथित गड़बड़ी यह संकेत देती है कि छोटे-छोटे स्तर पर हो रही वसूली भी बड़े पैमाने पर असर डालती है।


योजनाओं के लाभार्थी बनाम जमीनी हकीकत

सरकार की योजनाएं—जैसे पोषण अभियान, सुपोषण चौपाल और प्रारंभिक बाल विकास—कागजों में जितनी प्रभावी दिखती हैं, जमीन पर उनका क्रियान्वयन उतना ही चुनौतीपूर्ण नजर आता है।
खेल सामग्री तक के वितरण में भेदभाव के आरोप यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या वास्तव में बच्चों तक संसाधन पहुंच पा रहे हैं या बीच में ही सिस्टम कमजोर हो रहा है।


कार्यकर्ताओं पर दबाव, सेवाओं पर असर

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ग्रामीण और शहरी गरीब तबकों के बीच सरकार की योजनाओं का पहला चेहरा होती हैं। यदि वही असुरक्षित और दबाव में काम करेंगी, तो इसका सीधा असर बच्चों के पोषण, टीकाकरण और शिक्षा पर पड़ेगा।
कार्यकर्ताओं द्वारा “असहज कार्यस्थल” की बात कहना प्रशासनिक संस्कृति पर भी सवाल उठाता है।


प्रशासन की भूमिका और जवाबदेही

एसडीएम T. Arvind Kumar द्वारा जांच का आश्वासन और परियोजना अधिकारी Suruchi Shyam द्वारा शिकायत को उच्च स्तर पर भेजना प्रारंभिक कदम जरूर है, लेकिन असली चुनौती निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की है।
ऐसे मामलों में अक्सर जांच लंबी खिंचती है, जिससे पीड़ित पक्ष का भरोसा कमजोर पड़ता है।


क्या कहती है व्यापक तस्वीर?

यह मामला केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं माना जा रहा। राज्य के कई जिलों से समय-समय पर आंगनबाड़ी व्यवस्था में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं।
यदि इन शिकायतों का समाधान पारदर्शी तरीके से नहीं किया गया, तो यह महिला एवं बाल विकास योजनाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।


आगे क्या?

अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो न सिर्फ संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई होगी, बल्कि पूरे सिस्टम में सुधार के लिए भी ठोस कदम उठाने होंगे।
वहीं, यदि आरोप बेबुनियाद निकलते हैं, तो कार्यकर्ताओं और प्रशासन के बीच विश्वास बहाली की चुनौती सामने होगी।


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