छत्तीसगढ़
बारिश से पहले नहीं उठा 333 करोड़ का धान, 31 जिलों में नुकसान का खतरा; बस्तर संभाग सबसे ज्यादा प्रभावित


CG Paddy Lifting Delay: छत्तीसगढ़ में धान खरीदी खत्म हुए करीब चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब भी लाखों क्विंटल धान खरीदी केंद्रों में खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ है। प्रदेश के 31 जिलों में करीब 10.76 लाख क्विंटल धान का उठाव नहीं हो पाया है, जिसकी कीमत 333 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जा रही है।
मानसून नजदीक आने के साथ अब यह चिंता बढ़ गई है कि अगर समय पर बारिश शुरू हो गई तो बड़ी मात्रा में धान खराब हो सकता है। सबसे ज्यादा चिंता बस्तर संभाग को लेकर है, जहां चार लाख क्विंटल से ज्यादा धान अब भी केंद्रों में पड़ा है। लगातार देरी के कारण किसानों, समितियों और प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
बस्तर संभाग में धान उठाव की स्थिति सबसे ज्यादा खराब बताई जा रही है। यहां करीब 200 खरीदी केंद्रों में 4 लाख 56 हजार क्विंटल धान अब भी खुले में रखा हुआ है। समर्थन मूल्य के हिसाब से इसकी कीमत करीब 141 करोड़ रुपए आंकी गई है।
प्रशासन ने धान उठाव के लिए 165 राइस मिलर्स को जिम्मेदारी दी थी और पहले 31 मार्च तक धान उठाने की समय सीमा तय की गई थी। बाद में इसे बढ़ाकर 31 मई किया गया, लेकिन इसके बावजूद काम पूरा नहीं हो सका। कई जगह धान तिरपाल के सहारे रखा गया है, जबकि कुछ केंद्रों में पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम भी नहीं हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश शुरू होते ही स्थिति और गंभीर हो सकती है।
राजनांदगांव जिले में भी धान उठाव की रफ्तार बेहद धीमी है। जिले की 96 समितियों में से 79 समितियों में अब भी करीब 56 हजार क्विंटल धान पड़ा हुआ है। इसकी कीमत करीब 17 करोड़ रुपए बताई जा रही है। फरवरी से मई तक कई बार मौसम बदलने और बेमौसम बारिश होने से धान को नुकसान पहुंचने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
कुछ केंद्रों में धान सूखने लगा तो कुछ जगहों पर नमी बढ़ने से गुणवत्ता प्रभावित हुई। केवल कुछ समितियों से ही पूरा धान उठाया जा सका है। स्थानीय किसानों का कहना है कि समय पर उठाव नहीं होने से सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। धान खरीदी व्यवस्था को लेकर विपक्ष भी सरकार पर निशाना साध रहा है।
छत्तीसगढ़ राइस मिलर्स एसोसिएशन का कहना है कि धान उठाव में देरी के पीछे कई व्यावहारिक समस्याएं हैं। एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल बोथरा के मुताबिक बस्तर क्षेत्र में एक साथ बड़ी संख्या में डिलीवरी ऑर्डर जारी होने से ट्रांसपोर्ट वाहनों की कमी आ गई।
इसके अलावा नान गोदाम और निजी गोदामों में पर्याप्त जगह नहीं होने से भी समस्या बढ़ी। बस्तर से दूसरे जिलों तक लंबी दूरी में धान पहुंचाने के लिए भारी वाहनों की जरूरत पड़ती है, लेकिन समय पर गाड़ियां नहीं मिल पा रहीं।
मिलर्स का दावा है कि 15 जून तक हर हाल में बचा हुआ धान उठा लिया जाएगा। हालांकि मौसम विभाग की चेतावनी और मानसून की संभावित एंट्री को देखते हुए प्रशासन की चिंता अभी भी बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आने वाले दिनों में तेज बारिश होती है और धान लंबे समय तक खुले में पड़ा रहता है, तो उसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है। इसका असर सीधे सरकारी भंडारण, चावल उत्पादन और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर पड़ सकता है।
धान खराब होने की स्थिति में करोड़ों रुपए का नुकसान होने की आशंका है। यही वजह है कि अब प्रशासन, मार्कफेड और राइस मिलर्स पर तेजी से धान उठाव पूरा करने का दबाव बढ़ गया है।
ग्रामीण इलाकों में लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब हर साल मानसून तय समय पर आता है, तो फिर धान परिवहन की योजना पहले से मजबूत क्यों नहीं बनाई जाती। फिलहाल सभी की नजर 15 जून की समय सीमा और मानसून की चाल पर टिकी हुई है।