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सैया भए कोतवाल, तो डर कहेका…! हजारों टन फ्लाई ऐश खेतों में, पर्यावरण विभाग गहरी नींद में

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रायगढ़ । जिले में पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाला विभाग इस कदर गहरी नींद में है कि प्लांटों से निकलने वाला हजारों टन जहरीला फ्लाई ऐश खुलेआम खेतों, खाली जमीनों और आबादी के पास डाला जा रहा है—और जिम्मेदार अफसरों को न जगह की परवाह है, न नियमों की।

स्थिति यह है कि प्लांटों से निकलने वाले फ्लाई ऐश की मात्रा और निपटान स्थल की जानकारी कागजों में तो दर्ज होती है, लेकिन हकीकत में ट्रांसपोर्टर अपने भाड़े की बचत के लिए माल को बीच रास्ते में ही कहीं भी खाली कर देता है। खेतों में कालिख बिछ रही है, हवा ज़हर बन रही है और पर्यावरण विभाग मूकदर्शक बना बैठा है।

जब कोई जागरूक नागरिक इस अवैध डंपिंग की सूचना देने पर्यावरण विभाग पहुंचता है, तो कार्रवाई के बजाय उससे उलटे सवाल पूछे जाते हैं—
“किस प्लांट का माल है?”
“गाड़ी किसकी है?”

इतना ही नहीं, सवालों के जवाब देने के बाद भी शिकायतकर्ता को राहत नहीं मिलती। बल्कि उससे यह तक पूछ लिया जाता है—
“आप कौन हैं?”
“आपको क्या मतलब?”
“कानून क्यों बता रहे हो?”

और तब तक, जब तक फाइल खुलती है या “पता करवाते हैं” कहा जाता है, गाड़ी माल खाली कर दोबारा नई खेप लेने प्लांट की ओर रवाना हो चुकी होती है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि शिकायत की भनक लगते ही अफसर मैनेजमेंट को फोन कर देते हैं—
“शिकायत आई है, रूट बदल लो।”

यही वजह है कि कार्रवाई शून्य है और प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। सवाल यह है कि क्या सरकारी वेतन, सुविधाएं और जिम्मेदारी सिर्फ कुर्सी तोड़ने के लिए ली जा रही हैं?

अब हालत यह है कि दो-तीन साल के लिए तैनात अधिकारी हमारे शहर की हवा, मिट्टी और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का फैसला कर रहे हैं—और आमजन को चुप रहकर “जी सर, जी सर” कहने की सलाह दी जा रही है। क्योंकि आवाज़ उठाना आज भी “विकास विरोधी” कहलाता है।

फ्लाई ऐश के इस काले ज़हर का तमाशा प्रशासन भी देख रहा है और जनता भी। फर्क सिर्फ इतना है कि जनता इसे मजबूरी में देख रही है—और विभाग मिलीभगत में।

सवाल साफ है:
क्या पर्यावरण विभाग नींद से जागेगा, या फिर वागड़ की आबोहवा यूँ ही कागज़ी नियमों और असली लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेगी?

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