सक्ती जिले में फ्लाई एश डंपिंग का गोरखधंधा

रायगढ़ से पहुंचे ट्रांसपोर्टर, 35 लाख टन राखड़ बिना नियमों के जमीनों में फेंका गया
सक्ति। रायगढ़ जिले के पावर प्लांटों से निकलने वाला फ्लाई एश अब सक्ती जिले की जमीनों में डंप किया जा रहा है। यहां नियम-कायदे पूरी तरह ताक पर रख दिए गए हैं, क्योंकि पूरा तंत्र “सेटिंग” पर चल रहा है। सबसे ज्यादा फ्लाई एश सारडा एनर्जी (पूर्व में एसकेएस पावर) का है, जिसने अकेले करीब 17 लाख टन राखड़ सक्ती की जमीनों में डाल दिया है।
रायगढ़ में सख्ती, सक्ती में ढील
रायगढ़ जिले में फ्लाई एश की अवैध डंपिंग पर पर्यावरण विभाग की कड़ी कार्रवाई के बाद हालात सुधरे। अब वहां बिना तिरपाल के एश का परिवहन नहीं किया जाता। लेकिन सख्ती से बचने के लिए ट्रांसपोर्टरों ने अपना रुख सक्ती जिले की ओर मोड़ लिया।
बिलासपुर स्थित क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी की लापरवाह अनुमति से पिछले दो साल में ही सक्ती जिले की जमीनों में करीब साढ़े 35 लाख टन फ्लाई एश डंप किया जा चुका है।
नियमों की अनदेखी
सक्ति जिले में जमीनों के गलत प्रतिवेदन बनाकर डंपिंग के लिए एनओसी जारी कर दी जाती है। पर्यावरण विभाग यहां न तो मौका-मुआयना करता है और न ही किसी तरह की कार्रवाई। सरकारी जमीनों पर भी फ्लाई एश की अवैध डंपिंग की गई है। कई जगह तो चरनोई भूमि पर भी राखड़ फेंक दिया गया है।
ट्रांसपोर्टरों का गठजोड़
सारडा एनर्जी ने फ्लाई एश उठाव के लिए करीब 10 ट्रांसपोर्टरों को ठेका दिया है। इनमें प्रमुख नाम हैं—
- मुकेश पटेल
- निखिल कंस्ट्रक्शन
- रायगढ़ मोटर्स एंड लॉजिस्टिक्स
- पवनपुत्र ट्रांसपोर्ट
- चंद्रा क्रशर उद्योग
- निष्ठा लॉजिस्टिक्स
- इशिका कंस्ट्रक्शन
- मां अंबे लॉजिस्टिक्स
- रेफेक्स इंडस्ट्रीज
इनमें से रेफेक्स कंपनी का नाम एनटीपीसी से भी जुड़ा हुआ है।
बिना उपयोग किए ही डंपिंग
नियमों के अनुसार, फ्लाई एश का यूटीलाइजेशन होना चाहिए, लेकिन सारडा एनर्जी और उसके ट्रांसपोर्टरों ने “लो-लाइंग एरिया” के नाम पर कहीं भी एश डंप कर दिया। न तो जीपीएस की निगरानी है और न ही नियमित जांच। बिलासपुर पर्यावरण विभाग के अधिकारी मौके पर जाकर निरीक्षण तक नहीं करते।
अन्य कंपनियों की भूमिका
सिर्फ सारडा एनर्जी ही नहीं, बल्कि जेएसडब्ल्यू स्टील, एनटीपीसी लारा, जिंदल स्टील एंड पावर, टीआरएन एनर्जी और अडाणी पावर ने भी सक्ती जिले में अलग-अलग जगहों पर राखड़ फेंका है।
निष्कर्ष
रायगढ़ जिले की तरह यदि सक्ती में भी पर्यावरण विभाग ने सख्ती दिखाई होती तो स्थिति इतनी भयावह न होती। लेकिन कार्रवाई के नाम पर चुप्पी साध लेने से पावर प्लांटों और ट्रांसपोर्टरों को खुली छूट मिल गई है।






