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रायपुर साहित्य उत्सव: ‘राष्ट्रीय मीडिया में बहस के मुद्दे’ पर दूसरे दिन हुआ सार्थक विमर्श

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रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन आयोजित परिचर्चा ‘राष्ट्रीय मीडिया में बहस के मुद्दे’ ने मीडिया की वर्तमान भूमिका, प्राथमिकताओं और भविष्य की चुनौतियों पर सार्थक विमर्श को मंच प्रदान किया। इस सत्र का संचालन श्री वरुण सखा ने किया।

   वरिष्ठ पत्रकार अनिल पाण्डेय ने कहा कि राजनीति का मीडिया के केंद्र में आना एक सकारात्मक बदलाव है। उन्होंने बताया कि एक समय मीडिया में बॉलीवुड और सिनेमा की खबरों का दबदबा था, लेकिन बीते एक दशक में राजनीति प्रमुख विषय के रूप में उभरी है। उन्होंने सरकार से प्रेस आयोग या मीडिया आयोग के गठन की मांग करते हुए कहा कि समयानुकूल नीतियां और नियमन बनने से पत्रकारों के हितों की रक्षा संभव होगी। उन्होंने यह भी कहा कि आज टीवी चैनलों के प्राइम टाइम डिबेट के विषय सोशल मीडिया से तय हो रहे हैं। पत्रकारों के लिए संवेदनशीलता, अध्ययनशीलता और समुचित प्रशिक्षण को उन्होंने अत्यंत आवश्यक बताया।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नक्सलवाद से जुड़ी घटनाओं को तो राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता मिलती है, लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हो रहे सकारात्मक बदलावों और विकास कार्यों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाता। उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा कि लोकतंत्र को पंचायत से लेकर संसद तक मजबूत करना मीडिया की अहम जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया केवल टीवी तक सीमित नहीं है, बल्कि अखबार और पत्र-पत्रिकाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने मीडिया की व्यावहारिक चुनौतियों पर चिंता जताते हुए कहा कि सूचना का सबसे बड़ा स्रोत सरकार है और लगातार छुट्टियों की स्थिति में अखबार निकालना भी कठिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों में जमीनी रिपोर्टिंग कम होती जा रही है, क्योंकि यह खर्चीली है, जबकि प्रायोजित खबरें और डिबेट कम लागत में आसान विकल्प बन गए हैं। इससे पत्रकारिता अपनी मूल भावना, भाषा-कौशल और अभिव्यक्ति से भटक रही है।

परिचर्चा में यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पत्रकारिता की शिक्षा तो दी जा रही है, लेकिन व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी साफ दिखाई देती है। पत्रकारिता धीरे-धीरे समाज और खबर की जिम्मेदारी से हटकर केवल कंटेंट जेनरेशन तक सीमित होती जा रही है, जो भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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