रायगढ़
रायगढ़ में वन विभाग की लापरवाही उजागर, महंगे उपकरण सिर्फ फाइलों में, 6 माह में 9 हाथियों की मौत

रायगढ़। जिले के दोनों वन मंडलों (धरमजयगढ़ और रायगढ़) में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे तमाम सरकारी दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आ रहे हैं। आधुनिक तकनीक और भारी भरकम बजट के बावजूद हाथियों की सुरक्षा राम भरोसे है।पिछले महज 6 महीनों के भीतर जिले में 9 हाथियों की असमय मौत हो चुकी है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली और उसकी मुस्तैदी पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जिसमें सोमवार को एक और शावक की मौत ने विभाग में हड़कंप मचा दिया है जबकि ग्रामीणों से लेकर वन्य जीव प्रेमियों ने सीधे दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
जानकारी के अनुसार सोमवार सुबह ग्रामीणों ने छाल रेंज के खरसिया वन परिक्षेत्र में मौजूद मांड नदी में करीब 3 से 5 माह के हाथी बच्चे का शव पानी में डूबा हुआ देखा। घटना की खबर फैलते ही मौके पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई और इसकी सूचना वन विभाग को दी गई। इधर एक और हाथी के बच्चे की मौत की सूचना मिलते ही सूचना वन विभाग को मिलते ही विभाग में हड़कंप मच गया, आनन फानन में वन अमला मौके पर पहुंचा। इसके बाद ग्रामीणों की मदद से शावक के शव को नदी से बाहर निकाला गया।
वन विभाग ने पंचनामा कार्रवाई कर शव का परीक्षण कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। फिलहाल नदी में किन कारणों से मौत हुई है यह रहस्य बरकरार है। वन विभाग पानी पीने या नहाने के दौरान डूबने से मौत होने की आशंका जता रही है। जबकि लगातार वन मंडल के विभिन्न क्षेत्रों में इस तरह पानी में डूबकर मौत होने का सिलसिला एकाएक पिछले कुछ सालों के रिकॉड में बढ़ गया हैं, इस तरह नदी तालाब के पानी में डूबकर हाथियों के बच्चे की मौत कई तरह के सवालों को उत्पन्न कर रहा है। बहरहाल विभाग का जंगलों में हर तरह की निगरानी का दवा केवल कागजों तक ही सिमटा नज़र आ रहा हैं।
इस वर्ष अब तक गई
- 27 जनवरी को घरघोड़ा रेंज के कमतरा बीट में चट्टान में फंसकर 1 हाथी के बच्चे की मौत
- 22 फरवरी को तमनार रेंज के झिंगोल परिसर में 1 हाथी के बच्चे की मौत
- 11 मार्च को घरघोड़ा रेंज के कुरकुट नदी में 2 हाथी के बच्चों का शव मिला
- 23 अप्रैल को लैलूंगा रेंज के आमापाली में 1 हाथी के बच्चे की मौत
- 8 मई को छाल रेंज के घोघरा डेम में 1 हाथी के बच्चे की मौत
- 11 मई को छाल रेंज के तरकेला गांव में 1 हाथी के बच्चे की मौत
- 22 मई की रात छाल रेंज के पुसल्दा गांव में तालाब में नहाते समय एक हाथी के बच्चे की मौत
हाईटेक संसाधनों का ढिंढोरा, जंगलों के बजाएं कागजों में निगरानी
हाथियों की लगातार हो रही मौतों ने विभाग के उस सुरक्षा तंत्र की पोल खोल दी है, जिसका जोर-शोर से ढिंढोरा पीटा जाता है। जंगलों में निगरानी के लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं है, बताया जाता है कि विभाग थर्मल ड्रोन रात के अंधेरे में हाथियों की लोकेशन ट्रेस करने के लिए तैनात किए है, दूसरी ओर ट्रैप कैमरे संवेदनशील इलाकों और कॉरिडोर में मूवमेंट रिकॉर्ड करने के लिए लगाए गए,रात्रि गश्त,मैदानी अमले द्वारा चौबीसों घंटे जंगलों में मुस्तैद रहने का नियम। निगरानी समितियां,ग्रामीणों को अलर्ट करने और हाथियों को सुरक्षित रास्ता देने का जिम्मा। इन सब तामझाम के बाद भी अगर आधे साल में 9 वन्यजीव दम तोड़ दें, तो यह साफ है कि या तो इन तकनीकों का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है या फिर मैदानी अमला अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ चुका है।
लोगों में आक्रोश, जवाबदेही तय करने की मांग
हाथियों की लगातार मौत और उनके रिहाइशी इलाकों में बार-बार आने से ग्रामीणों में भी भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि जब हाथी गांव के करीब पहुंच जाते हैं या कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तब जाकर विभाग की नींद टूटती है। वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि करोड़ों रुपये की तकनीक और निगरानी तंत्र होने के बाद भी यदि नतीजे शून्य हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि जल्द ही कोई ठोस और प्रभावी जमीनी कदम नहीं उठाए गए, तो रायगढ़ के जंगलों से हाथियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
दोनों वन मंडल में मौत का हाट स्पाट अब तक छाल रेंज
इस साल जनवरी से लेकर आज तक दोनों वन मंडलों में हाथियों की मौत के ये मुख्य पॉइंट रहे हैं, जिनमें धरमजयगढ़ का छाल रेंज हाथियों के लिए सबसे बड़ा ‘हॉटस्पॉट’ (खतरे का क्षेत्र) बनकर उभरा है। इस रेंज में रायगढ़ तथा कोरबा से हाथियों का आना जाना है मानो यह एक सुरक्षित कारीडोर है। लगातार हो रही मौत से वन विभाग सक्रिय होने के बजाए मानो निगरानी केवल हवा हवाई तौर पर कर रही है, यहां यह बताना लाजिमी होगा कि दो दिन पहले इसी इलाके में हाथियों के झुंड पर मधुमक्खी बिदक है थी और हाथियों को सुरक्षित ठिकाने की ओर आना पड़ा था।






