छत्तीसगढ़

युवाओं से उनके अंदाज में जुड़कर धर्म की ओर ला रहे इंद्रेश जी महाराज, बोले- उनकी लाइफस्टाइल को समझकर अध्यात्म से जोड़ना जरूरी

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सरल भाषा, समकालीन उदाहरण और भजनों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच रही भागवत कथा

बोले- युवा भटके नहीं हैं, बस उनके तरीके से कोई उन्हें धर्म से जोड़ नहीं रहा

रायपुर। भारत में भागवत कथा वाचन की परंपरा सदियों पुरानी रही है। समय के साथ कथा कहने की शैली में भी बदलाव आया है। आज जब युवा पीढ़ी की रुचियां, जीवनशैली और सवाल पहले की तुलना में अलग हैं, ऐसे में धर्म और अध्यात्म को उनके बीच पहुंचाने के लिए पारंपरिक ज्ञान के साथ संवाद की नई शैली भी जरूरी हो गई है। इसी बदलते दौर में युवा भागवत कथावाचक इंद्रेश जी महाराज ने अपनी अलग पहचान बनाई है।

अपने मधुर और ओजपूर्ण कंठ से भजनों की प्रस्तुति, सरल भाषा में धार्मिक विषयों को समझाने और कथा के दौरान युवाओं से सीधे संवाद करने की शैली के कारण इंद्रेश जी महाराज की कथाओं में बड़ी संख्या में युवा भी दिखाई देते हैं। परिवार से मिली कथा-वाचन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कम समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

‘युवा धर्म से दूर नहीं, उन्हें उनके तरीके से जोड़ने की जरूरत’

रायपुर प्रवास के दौरान हुई बातचीत में इंद्रेश जी महाराज ने युवाओं और धर्म के बीच संबंध को लेकर अपनी सोच साझा की। उन्होंने कहा कि यह मान लेना सही नहीं है कि आज की युवा पीढ़ी धर्म या अध्यात्म से जुड़ना नहीं चाहती। उनके मुताबिक समस्या यह है कि युवाओं को उनकी जीवनशैली और उनके सवालों के अनुरूप अध्यात्म से जोड़ने का प्रयास कम हुआ है।

उन्होंने बताया कि जब युवाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को ध्यान में रखते हुए अध्यात्म की बात की जाती है और परीक्षा, रिश्तों, दोस्ती तथा जीवन की दूसरी परिस्थितियों से जुड़े उदाहरणों के माध्यम से धर्म को समझाया जाता है, तो युवा उससे आसानी से जुड़ते हैं। उनके अनुसार भजन और कीर्तन भी ऐसे भाव में प्रस्तुत किए जाने चाहिए, जिससे युवाओं को आनंद मिले और उनके भीतर भक्ति की भावना मजबूत हो।

10वीं के बाद सिंगर बनने का था सपना

इंद्रेश जी महाराज ने अपनी जीवन यात्रा से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि 10वीं कक्षा पास करने के बाद उनके मन में गायक बनने की इच्छा थी। उन्होंने 11वीं और 12वीं की पढ़ाई प्राइवेट की और इसके बाद मुंबई जाकर सिंगर बनने की तैयारी करने का मन बनाया था।

इसी दौरान परिस्थितियां बदलीं और उनका जीवन एक अलग दिशा में आगे बढ़ गया। परिवार में पहले से ही कथा-वाचन की परंपरा थी। उनके नाना जी स्वयं कथा करते थे और उनकी इच्छा थी कि इंद्रेश जी महाराज भी आगे चलकर कथावाचक बनें। नाना जी ने उनकी पहली कथा भी सुनी थी।

पिता से नहीं, गुरुजनों से लिया कथा और शास्त्रों का अध्ययन

जब उन्होंने कथावाचन को अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया, तब उनके सामने गुरु के चयन का सवाल भी था। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने स्वयं उन्हें पढ़ाने के बजाय उन्हें दूसरे गुरुजनों से अध्ययन करने की सलाह दी।

इंद्रेश जी महाराज के अनुसार उनके पिता का मानना था कि वे अपने पुत्र को स्वयं नहीं पढ़ा पाएंगे। इसके बाद उन्होंने अपने गुरुजनों से अध्ययन किया। उन्होंने शिव प्रसाद उपाध्याय जी को अपना प्रमुख गुरु बताते हुए शिवकरण पांडे जी और व्यासनंदन गुरु जी सहित अन्य गुरुजनों से भी शिक्षा प्राप्त करने की बात कही।

‘जो दूसरों को पढ़ाता है, उसे खुद पढ़ना बंद नहीं करना चाहिए’

बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और श्रोताओं के सामने कथा कहने वाले इंद्रेश जी महाराज का मानना है कि कथावाचक के लिए लगातार अध्ययन करते रहना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दूसरों को ज्ञान देना चाहता है, उसे स्वयं भी सीखने और पढ़ने की प्रक्रिया कभी बंद नहीं करनी चाहिए।

उनके मुताबिक लोकप्रियता और स्टारडम के साथ एक और चुनौती जुड़ी होती है। व्यक्ति को अपनी लोकप्रियता के बीच भी यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके ऊपर कोई ऐसा व्यक्ति या व्यवस्था हो, जो उसे जमीन से जोड़े रखे और लगातार सीखने के लिए प्रेरित करे।

‘जेन-जी को आज समझना होगा, बाद में लौटेंगे तो मौका मिले जरूरी नहीं’

इंद्रेश जी महाराज ने नई पीढ़ी से जुड़ने को लेकर भी अपनी सोच स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि आज जेन-जी के साथ संवाद का जो अवसर है, उसे अभी समझना जरूरी है। अगर आज के समय को छोड़कर बाद में उसी पीढ़ी से जुड़ने की कोशिश की जाएगी, तो जरूरी नहीं कि वही अवसर और स्वीकार्यता दोबारा मिले।

उनकी कथा शैली में इसी सोच की झलक दिखाई देती है। एक ओर जहां श्रीमद्भागवत, भक्ति और सनातन परंपरा का मूल स्वर कायम रहता है, वहीं दूसरी ओर युवाओं के वर्तमान जीवन, उनकी जिज्ञासाओं और रोजमर्रा की चुनौतियों को उदाहरण बनाकर आध्यात्मिक विषयों को उनके लिए सहज बनाने का प्रयास किया जाता है।

परंपरा के साथ बदलते समय की समझ

इंद्रेश जी महाराज की बातचीत से यह बात सामने आती है कि उनके लिए कथा केवल धार्मिक प्रसंगों का वाचन नहीं, बल्कि अलग-अलग पीढ़ियों के बीच संवाद का माध्यम भी है। उनका जोर इस बात पर है कि अध्यात्म का मूल स्वर कायम रखते हुए उसे उस भाषा और संदर्भ में लोगों तक पहुंचाया जाए, जिसे वे आसानी से समझ सकें।

इसी वजह से उनकी कथाओं में पारंपरिक भागवत ज्ञान के साथ आधुनिक जीवन के सवालों का मेल दिखाई देता है और बड़ी संख्या में युवा भी उनसे जुड़ते नजर आते हैं।

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